जिसकी पौत नहीं होती, उसी का मान सम्मान होता है।
हमारे गांव में जिसके पास पौत नहीं होती है,उसको अच्छा भाव मिलता है। कोई आपको अपने घर आने का निमंत्रण दे और आप चले गए और घर जाकर बोला “मेरी तो पौत नहीं हो रही थी,बड़ी मुश्किल से समय निकाला “तो इज्जत बढ़ जाती है भले ही आप उसके यहां फिर हफ्ते दिन ठहर जाओ।
खबरदार ! ये शब्द जाते ही आपकी जिह्वा से लपलपाते हुए समय-समय पर चार-पांच बार उच्चारित न हों, तो आपकी आवाभगत में कमी आना लाजिमी है। कई लोगों की पौत सामने वाली की स्थिति के आधार पर भी होती है। अपने लाभ का काम हो तो पौत हो जाती है,यदि घाटा हो रहा हो तो बोल दिया जाता है मेरी पौत नहीं हो रही है। गांव में कुछ लोग विशिष्ट कार्यों के लिए जाने जाते हैं उन की पौत न होना,अनिवार्य गुण होता है।
जैसे पाक कला के विशेषज्ञ, भजन गायकी के विशेषज्ञ, जिनके शरीर में देवता रहता है, जिन्हें डंगरिया कहा जाता है।
पहले इस श्रेणी में घास का लूट हालने वाले भी आते थे, लेकिन लोगों ने अब गाय पालना कम कर दिया है,इसलिए अब उनकी पौत होने लग गई है।
बहुत ज्यादा फायदा तो लूट हालने के विशेषज्ञों को नहीं होता था, लेकिन चारों तरफ से महिलाओं का समूह बैठा हो, और बीच में वह चाय पी रहे हों, सब तरफ से उनकी कला के प्रदर्शन की तारीफ होती थी, अब कोई नहीं करता है।लेकिन बाकी तीन प्रकार के विशेषज्ञों का जलवा अभी कायम है।
यदि यह लोग सीधे किसी के यहां बगैर ये वाक्य बोले चले जाएं, यह बात जमती नहीं, जिनके यहां जाते हैं उनको भी नहीं जमती है।घर में भी उसी की इज्जत होती है जिसकी पौत नहीं होती है।अब तो मैंने भी यह फंडा सीख लिया है। मैं भी कह देता हूं कि “मेरी पौत नहीं हो रही है”। कभी-कभी लोग पूछ लेते हैं कि भैय्या आप की पौत क्यों नहीं हो रही है?
सारे दिन तो बैठे रहते हो!मैंने पूछा और लोग कहते हैं पौत नहीं हो रही है तो उनको तो कभी नहीं पूछते हो ?क्यों नहीं हो रही है पौत ?
मुझसे यह सवाल पूछने के लिए तुम्हारी बड़ी पौत हो रही है।
अब तो घरवाले भी कहने लग गए हैं ” तुम्हें फश्के मारने से पौत कहां होती है ?
परसों तो मैंने बड़ा आश्चर्यजनक मामला देखा, कुछ लोग एक ब्राह्मण देवता को अपहरण जैसी स्थिति में उठा कर ले जा रहे थे। मैंने कहा, यह क्या कर रहे हो यह तो आपके कुल पुरोहित हैं।
उन्होंने कहा महाराज आपने ठीक पहचाना, यह हमारे आदरणीय कुल पुरोहित जी हैं। आज हमारे बूबू का श्राद्ध है, इनका अपहरण नहीं कर रहे हैं इनको उठाकर, छुपा कर ले जा रहे हैं,ताकि किसी को पता ना चले, इसलिए इनके मुंह में कपड़ा ठूंस रखा है।
आज नवमी के दिन, श्राद्ध बहुत ज्यादा होते हैं,और “इनकी पौत नहीं हो रही थी”,हमारे पिताजी एकबक्ती हैं, अब भूख से उनके पेट में बिटौव हो गए हैं, शाम तक भूख से फुड़ी फुड़ी के मर जाएंगे।
इसलिए इन्हें छुपा कर गठरी जैसी बांधकर, श्राद्ध करवाने के लिए अपने घर ले जा रहे हैं।
श्राद्ध के पश्चात कोई हमारे आंगन से ऐसे ही छुपाकर, गठरी में उठाकर अपने घर ले जाएगा !
– रमेश चम्पत



