Poems

काली कुमाऊँ • कविता

कविताएँ

पहाड़, स्मृतियाँ और मन की आवाज़ों से जन्मी कविताओं का संग्रह।

  • ॥श्रीजानकीवल्लभो विजयते॥

    लेखक: अखिलेश जोशी 'अखि-लेख'

    ॥श्रीजानकीवल्लभो विजयते॥

    मैं रमा ना राम में, तोराम मुझमें रम गएरूप जब उनका दिखा, तोनयन जैसे थम गए।बुद्धि से वो थे परे, तोमन से फिर वो मान गए।और कुछ की चाह ना, तोजितने थे सब, तम गए॥

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  • माँ के बाद

    लेखक: दिनेश जोशी ‘नीरव’

    माँ के बाद

    एक बस घर की तुलसी सूखीएक बस गुजिया फीकी फीकीएक बस सावन पीला पीलाएक बस मौसम गीला गीलाएक बस कोने में जाला हैएक बस मंदिर में ताला हैएक बस घास उगी दरारेंएक बस काई लगी दीवारेंएक बस बरसे बैरन बैरन धूपएक बस आँगन की सूखी दूबवही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?तुम गयी…

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  • मीठा भविष्य चाहिए

    लेखक: डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी

    मीठा भविष्य चाहिए

    मुझे कड़वे सच से परहेज नहीं,बस झूठी मिठास नहीं चाहिए।मुझे बड़ी-बड़ी बातें नहीं,छोटी-छोटी पूरी होती उम्मीदें चाहिए।एक ऐसी सुबह चाहिए,जहाँ चाय के साथ अखबार मेंकोई अच्छी खबर हो,लड़ाई नहीं, हँसी हो।जहाँ सपने सिर्फ देखे न जाएं,बुने भी जाएं,और पूरे भी हों –

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  • पागल हसरत

    लेखक: दिनेश जोशी ‘नीरव’

    पागल हसरत

    पागल हसरत लेकर जब भी दूर कहीं भागे हैंफिर ठंडी रातों में अक्सर तन्हा तन्हा जागे हैंतुमसे मिलते रहे लेकिन, पूरे ना हो सके तुम्हारेतन्हाई में सोच रहे, हम भी कितने अभागे हैंतुम संग पूरा घर हमसे बातें करता रहता थातुम बिन अब पूरे घर में परदे हैं दरवाजे हैंजितना सुलझाने की कोशिश,उतना उलझा बैठा…

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  • जहाँ मौन ही मंत्र है

    लेखक: डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी

    जहाँ मौन ही मंत्र है

    ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है —ऊष्मा हमेशा गर्म से ठंडी ओर बहती है,और समय के साथ हर व्यवस्था में,एन्ट्रॉपी बढ़ती है।एन्ट्रॉपी माने — disorderness,एन्ट्रॉपी माने — अव्यवस्था,माने — बिखराव, शोर, अराजकता।और इसके उलट,सुव्यवस्था माने — ठहराव, लय, मौन।कहीं जीवन की गति तेज है,वहाँ उत्सव है, उमंग है, शोर भी है,और कहीं ठहराव है,वहाँ तप…

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  • रिश्ता पहाड़ों से: कुमाऊँ की वादियों पर भावुक कविता

    लेखक: दिनेश जोशी ‘नीरव’

    रिश्ता पहाड़ों से: कुमाऊँ की वादियों पर भावुक कविता

    ठंडी ठंडी हवा ये, ये खुला साफ़ आसमान हैइन वादियों में, वक्त भी ठहरा हुआ मेहमान हैजाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से हैकुछ तो है कहीं जो, दिल का रिश्ता पहाड़ों से हैटेढ़े मेढे रस्ते मगर, साफ़ दिलों का ठिकाना हैरहता हूं कहीं भी मगर, तेरे पास लौट आना हैपंचाचूली की चोटियों…

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  • कितने दिनों के लिए आये हो

    लेखक: दिनेश जोशी 'नीरव

    कितने दिनों के लिए आये हो

    आँगन के कोने में पड़ा तख़्त,ठूठ हुए पुलम दाड़िम के दरख्त,नक्काश खिड़कियों से झाँकता वक़्तपूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?ओखली वाला सबसे बड़ा आँगन,घुटनों चलता बीता हुआ बचपन,नवरात्रि की रातों का जागन,गेरू से पुते चाक का ऐपणपूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?बंज़र हुए दूर दराज के खेत,गाय की घंटी,…

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  • निस्वास

    लेखक: दिनेश जोशी ‘नीरव’

    निस्वास

    काफल पाको बुरास फूलीम्यारा मन मा निस्वास लागी गेत्वेके मेरी हर बात भूलीम्यारा मन मा निस्वास लागी गेरिमझिमा बरखा लागी चौमासा महीनात्वे दगड़ी जो बितायी याद औनी दीनामेरी आँखों में सोन भादोंम्यारा मन मा निस्वास लागी गेधुर जंगला फूल खिलीं पानी का धाराकावी कावी रात आइ परान सूखी म्यारातेरी कोई कुसल नि आयीम्यारा मन मा…

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