पागल हसरत लेकर जब भी दूर कहीं भागे हैं
फिर ठंडी रातों में अक्सर तन्हा तन्हा जागे हैं
तुमसे मिलते रहे लेकिन, पूरे ना हो सके तुम्हारे
तन्हाई में सोच रहे, हम भी कितने अभागे हैं
तुम संग पूरा घर हमसे बातें करता रहता था
तुम बिन अब पूरे घर में परदे हैं दरवाजे हैं
जितना सुलझाने की कोशिश,उतना उलझा बैठा हूँ
दोनों मुझको समझ ना आये, रिश्ते हैं या धागे हैं
अंधी दौड़ में ऐसे दौड़े, सबसे आगे ख़ुद को पाया
लेकिन मुड़ पीछे देखा तो, जो पीछे थे, आगे हैं
बोलो तुम कैसे इस मिथ्या, दुनिया से बच पाओगे
स्वर्ण हिरण के पीछे तो स्वयं राम हमारे भागे हैं
– दिनेश जोशी ‘नीरव’



