॥श्रीजानकीवल्लभो विजयते॥
मैं रमा ना राम में, तोराम मुझमें रम गए
रूप जब उनका दिखा, तोनयन जैसे थम गए।
बुद्धि से वो थे परे, तोमन से फिर वो मान गए।
और कुछ की चाह ना, तोजितने थे सब, तम गए॥
मैं रमा ना राम में, तोराम मुझमें रम गए
रूप जब उनका दिखा, तोनयन जैसे थम गए।
बुद्धि से वो थे परे, तोमन से फिर वो मान गए।
और कुछ की चाह ना, तोजितने थे सब, तम गए॥
एक बस घर की तुलसी सूखीएक बस गुजिया फीकी फीकीएक बस सावन पीला पीलाएक बस मौसम गीला गीलाएक बस कोने में जाला हैएक बस मंदिर में ताला हैएक बस घास उगी दरारेंएक बस काई लगी दीवारेंएक बस बरसे बैरन बैरन धूपएक बस आँगन की सूखी दूबवही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?
एक बस होली में राग नहींएक बस फागुन में फाग नहींएक बस उत्तरायणी के घुघुते छूटेएक बस जौं तिल से रिश्ते टूटेएक बस कानों से दूर हरेलाएक बस नीरस बग्वाल का मेलाएक बस गेरू ऐपण दशार नहींएक बस गोधन बल्दी घी त्यार नहींवही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?
एक बस गैया रोटी का चलन नहींएक बस बामन का दछन नहींएक बस गंगाजल का बर्तन खालीएक बस पिठ्यॉँ की खोई थालीएक बस साँपों की व्यथा नहींएक बस गद्दू राजा कथा नहींएक बस जागर की बात नहींएक बस काफल वाली रात नहींवही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?
बस घर में कुछ सूनापन हैबस मन में एक भारीपन हैबस कान फाड़ता सन्नाटा हैबस चींटी पड़ा हुआ आटा हैबस खाना कुछ कच्चा पक्का हैबस जो मिल जाये वो अच्छा हैबस तितर बितर है पड़ा पस्त हैबस घर अलसाया अस्त व्यस्त है
मुझे कड़वे सच से परहेज नहीं,बस झूठी मिठास नहीं चाहिए।
मुझे बड़ी-बड़ी बातें नहीं,छोटी-छोटी पूरी होती उम्मीदें चाहिए।
एक ऐसी सुबह चाहिए,जहाँ चाय के साथ अखबार मेंकोई अच्छी खबर हो,लड़ाई नहीं, हँसी हो।
जहाँ सपने सिर्फ देखे न जाएं,बुने भी जाएं,और पूरे भी हों –
पागल हसरत लेकर जब भी दूर कहीं भागे हैंफिर ठंडी रातों में अक्सर तन्हा तन्हा जागे हैं
तुमसे मिलते रहे लेकिन, पूरे ना हो सके तुम्हारेतन्हाई में सोच रहे, हम भी कितने अभागे हैं
तुम संग पूरा घर हमसे बातें करता रहता थातुम बिन अब पूरे घर में परदे हैं दरवाजे हैं
जितना सुलझाने की कोशिश,उतना उलझा बैठा हूँदोनों मुझको समझ ना आये, रिश्ते हैं या धागे हैं
ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है —ऊष्मा हमेशा गर्म से ठंडी ओर बहती है,और समय के साथ हर व्यवस्था में,एन्ट्रॉपी बढ़ती है।
एन्ट्रॉपी माने — disorderness,एन्ट्रॉपी माने — अव्यवस्था,माने — बिखराव, शोर, अराजकता।
और इसके उलट,सुव्यवस्था माने — ठहराव, लय, मौन।
कहीं जीवन की गति तेज है,वहाँ उत्सव है, उमंग है, शोर भी है,और कहीं ठहराव है,वहाँ तप है, मौन है, सृजन की कोर है।
ठंडी ठंडी हवा ये, ये खुला साफ़ आसमान हैइन वादियों में, वक्त भी ठहरा हुआ मेहमान हैजाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से हैकुछ तो है कहीं जो, दिल का रिश्ता पहाड़ों से हैटेढ़े मेढे रस्ते मगर, साफ़ दिलों का ठिकाना हैरहता हूं कहीं भी मगर, तेरे पास लौट आना हैपंचाचूली की चोटियों को बादलों ने जब भी घेरा हैमन के आंगन में कहीं अनगिनत यादों का डेरा हैउजली धूप से, हरी दूब से, ये गुज़ारिश जाड़ों से हैजाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से हैकुछ तो है कहीं जो, दिल का रिश्ता पहाड़ों से हैफुर्सत से बैठें ज़रा तुमसे कई मुलाकातें करनी हैंअंगीठी की आँच सेकें, ढेरों लंबी बातें करनी हैंजैसे बात हो कल की, साथ मेरे अब भी यहीं होइतना है मुझे भी यकीं भूले मुझको तुम भी नहीं होनई हो पुरानी बचपन या जवानी हर कहानी बहारों से हैजाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से हैहर बात ऐसी है तेरी, दिल का रिश्ता पहाड़ो से है– दिनेश जोशी ‘नीरव’
आँगन के कोने में पड़ा तख़्त,ठूठ हुए पुलम दाड़िम के दरख्त,नक्काश खिड़कियों से झाँकता वक़्तपूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?ओखली वाला सबसे बड़ा आँगन,घुटनों चलता बीता हुआ बचपन,नवरात्रि की रातों का जागन,गेरू से पुते चाक का ऐपणपूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?बंज़र हुए दूर दराज के खेत,गाय की घंटी, नदिया और रेत,प्राइमरी स्कूल, खड़िया और स्लेटपूछते है , कितने दिनों के लिए आये हो?काफल बुरास का जंगल सारा,बेमन खामोशी से बहता धारा,सूखा हुआ देवदार पुकारापूछता है ,कितने दिनों के लिए आये हो?सूनी गौशाला में पद चाप,बैठकी होली के आलापदूर से आती ढोल की थापपूछती है, कितने दिनों के लिए आये हो?सूखी दूब दीवारों पर जाला,गले बँधी घुघुती की माला,इष्ट देव के मंदिर का तालापूछता है,कितने दिनों के लिए आये हो?कंफड़ जोगी के कीर्तन का चिमटा,जगरिए की जागर और उसका हुड़का,बूबू की अलमारी में तमाख और हुक्कापूछते हैं , कितने दिनों के लिए आये हो?खंडहर हुआ बडआमा का मकान,च्यूड बनाने को कुटते हुए धान,भूरी आँखों वाली अल्हड़ वो बानगाड़ गधेरे के सारे भूत मशानपूछते हैं , कितने दिनों के लिए आये हो?मासूम आँखें वो नाज़ुक हथेलियाँ,गोबर लिपे हुए जौं की बालियाँ,घर के बूढ़े के चेहरे की झुर्रियाँपूछती हैं, कितने दिनों के लिए आये हो ?कच्चा पैदल रस्ता सोचता है अक्सरपक्की सड़क को दया क्यों नही आतीशहर की ओर जाती है रोज़ लेकिनगाँव की ओर वापस क्यों नहीं आती
काफल पाको बुरास फूलीम्यारा मन मा निस्वास लागी गेत्वेके मेरी हर बात भूलीम्यारा मन मा निस्वास लागी गे
रिमझिमा बरखा लागी चौमासा महीनात्वे दगड़ी जो बितायी याद औनी दीनामेरी आँखों में सोन भादोंम्यारा मन मा निस्वास लागी गे
धुर जंगला फूल खिलीं पानी का धाराकावी कावी रात आइ परान सूखी म्यारातेरी कोई कुसल नि आयीम्यारा मन मा निस्वास लागीकौनी बॉर्डर में लागि लड़ाईम्यारा मन मा निस्वास लागी गे
एक छिन भी मी ना भुल्यों गौं घर बज़ारजब ले आंखां बंद करू तेरि भोली अनवारातेरि हँस हँस बत्यानु याद छम्यारा मन मा निस्वास लागी गेतेरि माथे की बिंदूरी हाए रेम्यारा मन मा निस्वास लागी गे