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काली कुमाऊँ / हमारी कहानी

हिमालय की छाँह में
एक अपना-सा अंतराल।

पहाड़ और गाँव का दृश्य

एक छोटी शुरुआत, बहुत-सी कहानियाँ।

क्यों बनी काली कुमाऊँ?

कुमाऊँ का नाम सुनते ही आँखों के सामने हिमालय, देवदार के जंगल, काली नदी और पत्थर के पुराने मंदिर आ जाते हैं। लेकिन इस पहाड़ी इलाके की असली दौलत उसकी कविताएँ, लोककथाएँ, ऐपण और हरेला जैसे त्योहार हैं। काली कुमाऊँ उसी साहित्य और संस्कृति को एक जगह इकट्ठा करने की कोशिश है। काली कुमाऊं उन आवाज़ों को सामने लाने का प्रयास है जो पहाड़ों, घाटियों और गांवों की जीवन-धारा से जन्म लेती हैं। अपनी सांस्कृतिक स्मृति को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना और उन सभी लोगों को जोड़ना है जो शब्दों और अपनी जड़ों में अर्थ खोजते हैं।

यहाँ शब्द किसी दौड़ में नहीं हैं। वे ठहरते हैं, सवाल पूछते हैं, याद दिलाते हैं और कभी-कभी पहाड़ की तरह चुपचाप आपके साथ बैठ जाते हैं।

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03 / हमारे बारे में

साहित्यिक यात्रा में हमारे सहयात्री — जो इसे सँवारते हैं।

01
अखिलेश जोशी

अखिलेश जोशी

मुख्य संरक्षक

मार्गदर्शक एवं प्रेरक — जिनके सानिध्य में यह धरोहर निरंतर फल-फूल रही है।

02
ललित मोहन गहतोड़ी

ललित मोहन गहतोड़ी

मिट्टी और मर्म के लेखक

पहाड़ के दर्द, गाँवों की खामोशी और पलायन… संवेदनाओं को इस तरह जीवंत करते हैं कि पाठक का मन भी उस दर्द से भर जाता है

03
रमेश चम्पत

रमेश चम्पत

लोकधर्मी-लेखक

कुमाऊँनी के किसी भी शब्द को पकड़कर ये पूरा का पूरा जीवंत सिनेमा आँखों के सामने खड़ा कर देते हैं—चाहे इनके लेख हों या कहानियाँ

04
दिनेश जोशी 'नीरव'

दिनेश जोशी ‘नीरव’

शब्द-शिल्पी

इनकी कलम गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान रूप से जादू चलाती है।

05
देवकी नंदन गहतोड़ी

देवकी नंदन गहतोड़ी

तर्क और मर्म के चितेरे

हर साधारण प्रतीत होने वाली बात के पीछे छुपे मूल सत्य को सामने ले आते हैं।

आइए, इस कारवां को आगे बढ़ाएं…

हर एक आवाज़ इस पहाड़ की कहानी कहती है, और हर एक शब्द इस संस्कृति की थाह लेता है। क्या आप अपनी मौलिक रचनाओं (लेख, कविता, कहानी या संस्मरण) के जरिए इस सफर का हिस्सा बनना चाहते हैं?

यदि हाँ, तो आपका स्वागत है। अपनी रचनाएँ हमें नीचे दिए गए माध्यम से भेजें, आइए मिलकर अपनी संस्कृति और भाषा के इस कारवां को और दूर तक ले चलें।

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