माँ के बाद

रचयिता: दिनेश जोशी ‘नीरव’

एक बस घर की तुलसी सूखी
एक बस गुजिया फीकी फीकी
एक बस सावन पीला पीला
एक बस मौसम गीला गीला
एक बस कोने में जाला है
एक बस मंदिर में ताला है
एक बस घास उगी दरारें
एक बस काई लगी दीवारें
एक बस बरसे बैरन बैरन धूप
एक बस आँगन की सूखी दूब
वही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?
तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?

एक बस होली में राग नहीं
एक बस फागुन में फाग नहीं
एक बस उत्तरायणी के घुघुते छूटे
एक बस जौं तिल से रिश्ते टूटे
एक बस कानों से दूर हरेला
एक बस नीरस बग्वाल का मेला
एक बस गेरू ऐपण दशार नहीं
एक बस गोधन बल्दी घी त्यार नहीं
वही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?
तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?

एक बस गैया रोटी का चलन नहीं
एक बस बामन का दछन नहीं
एक बस गंगाजल का बर्तन खाली
एक बस पिठ्यॉँ की खोई थाली
एक बस साँपों की व्यथा नहीं
एक बस गद्दू राजा कथा नहीं
एक बस जागर की बात नहीं
एक बस काफल वाली रात नहीं
वही मंज़िल वही सफर, क्या कुछ नहीं बदला ?
तुम गयी बहुत दूर, मगर क्या कुछ नहीं बदला ?

बस घर में कुछ सूनापन है
बस मन में एक भारीपन है
बस कान फाड़ता सन्नाटा है
बस चींटी पड़ा हुआ आटा है
बस खाना कुछ कच्चा पक्का है
बस जो मिल जाये वो अच्छा है
बस तितर बितर है पड़ा पस्त है
बस घर अलसाया अस्त व्यस्त है

हाँ पल पल वक़्त बदलता है
हाँ सूरज रोज़ निकलता है
हाँ क्यारी में एक नया सा काँटा
हाँ झुर्री भरे रूखे हाथों सा
हाँ अंदर से कोमल है ऐसा
हाँ निश्छल हृदय तुम्हारे जैसा
हाँ चुभती है सर्द हवा लेकिन
तेरी बातों सा जादू लाती है
हाँ मेरे घर के काँटों से भी
माँ के हाथों की खुशबू आती है

Spread the love
Scroll to Top