झपरू का सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनका परिवार पूर्वजों के समय से ही संपन्न था। झपरू काका का घर परिवार में बड़ा सम्मान था, इलाके में भी दबदबा कायम किया था। घरेलू कार्यों से निजात होने पर आसपास पड़ोसी गाँवों की पंचायतों में भागीदारी निभाने का शौक था। अवसर मिलते ही छोटी-मोटी चोरी में हाथ आजमा लेते थे।
संयोगवश किसी का हल, जुआ, या हलानी खेतों में छूट गई तो झपरू का की नजरों से नहीं बचती। एक दो साल भाड़ में छुपा लेते फिर एक हल की हल डांडी, दूसरे में और दूसरे की हलानी पहले में जोड़ देते,तो कुछ रंधा आदि चला कर सांचा सांठ देने में सिद्धहस्त थे।
शाम के समय नित्य प्रति झपरू का हाथ में घिघारू की छड़ी लेकर फेरिये रहते, रास्ते में कहीं झाड़ी पड़ी हो, या कूड़ा, गल्याते हुए, सुने जाते, “हाथ टूट गए हैं, कोई नहीं हटा देता कितने चलते हैं इस रास्ते से” और झाड़-झंकाड़ हटाने का पूरा ठान ठिबान करते थे। जिससे लोगों के मन में उनके प्रति हरीश चंद्र जैसा भाव उत्पन्न हो।
गल्याने का मुख्य उद्देश्य ढड़वे की तरह नजरें घुमा कर लौकी कद्दू का निरीक्षण करना होता था। मुख अंध्यार होते ही वापसी में फटाक से लौकी, कद्दू, फेट में भरकर, बाहर से पंखी का झोप हालकर चलते बनते। यदि कोई छोटा बच्चा देख रहा हो, तो “ये रात लेक भार क्याहन फेरी रहै”(इतनी रात तक बाहर क्यों घूम रहा है)? उच्चारित शब्दों के साथ दुलार पूर्वक नरमी वाला बैंत उसको मार देते, और कहते तेरे बूबू ने कहा था “काका! साग ना होलो त ली गैया”।
झपरू का जब गांव में किसी भी निमंत्रण में जाते, तो चुपचाप एक तीन-चार डिब्बों वाला बड़ा सा टिफिन भी थैले में भरकर अपने साथ ले जाते। उनकी पहली चिंता उस टिफिन को भरने की होती थी। टिफिन भरते ही उसको उसी थैले में रख कर समारोह के बगल वाले घर में छुपा देते। उसके बाद उनके पेट का भरान शुरू होता था। आते वक्त बड़े प्रसन्नचित्त होकर आते थे क्योंकि अगले तीन दिन का इंतजाम साथ में जो था।
ऐसे ही समय व्यतीत हो रहा था एक दिन बड़े बच्चे ने झपरू का से प्रस्ताव किया, सभी लोग द्याप्ता थान में पूजा करते हैं हमारे परिवार ने न कभी पूजा की, न ही कुछ चढ़ाया। गाँव के लोगों का पैना भी हमारे ऊपर हो गया है, क्यों न एक छोटी पूजा कर ली जाए।
लड़के के मुख से चढ़ावा और पूजा का नाम सुनते ही, झपरू का को जम ले गया, खोपड़ी भनकी गई, शरीर लकड़ी गया, पीछे रखी पटखाट में बदम्म से तेरछी गए। थोड़ी देर में उठकर झपरू का, लड़के के ऊपर भूखे शेर की तरह गुर्राये और अबोल हो गए, यहाँ तक कि डाहा से उस दिन खाना नहीं खाया।
रिसाये हुए झपरू का दूसरे दिन नाती पोतों के मन्याने पर दो गाश खाने को राजी हुए। खाते समय भी लड़के के कहे शब्द कानों में रस्सी बम की तरह फट रहे थे। अंत में ख्याल आया कि आजीवन चोरी में उम्र बिताकर, प्रायश्चित्त मिटाने और लोगों में अपनी करनी के ऊपर पर्दा डालने के लिए देवता के थान में बकरा चढ़ाना ठीक ही रहेगा, यह समझकर कि देवता ने तो खाना नहीं है, हमने ही खाना है।
पूजा के लिए झपरू का ने दो अल्टो बुक कर ली। एक अल्टो टैक्सी में उनका पूरा परिवार समा गया, एक टैक्सी में नामी-गिरामी रिश्तेदार। रह गए बेचारे गांव बिरादरी के लोग, सो उनसे पैदल चलने को कह दिया गया।परंतु गांव वालों के जोश और उत्साह में फिर भी कोई कमी नहीं थी, सीधे-साधे ग्रामीण झपरू की चालों को कभी नहीं जान पाए, उनके एक आदेश पर देवता के नाम की और झपरू का के काम की, ऐसा लगा कर गला फाड़कर जय घोष कर रहे थे।
झपरू का ने मझले लड़के की शादी में एक परिधान बनवाया था दो दशक पूर्व, उस ड्रेस को ऐसे ही अवसरों, या क्षेत्र में होने वाली नेताओं की रैली या गाँव की पंचायतों में ही निकालते। आज झपरू का फिर वही ड्रेस झपका कर चल रहे थे।
आगे-आगे ग्रामीण 50 किलो की घांट पैदल ले जाकर 20 किलोमीटर दूर द्याप्ता थान तक पूरा गला फाड़ जयकारा लगाते हुए जा रहे थे।
पीछे से दोनों अल्टो में झपरू का और उनका नामी-गिरामी रिश्तेदार परिवार, गर्व से जिराफ की तरह गर्दन निकालकर अल्टो के दरवाजे से बाहर झांक रहा था। द्याप्ता थान में सभी लोग छोटे छोटे झुण्ड में इकट्ठा होकर थकान मिटाने लगे।
चालाकी का खेल अब शुरू होना था। साथ आए हुए ग्रामीणों से उन्होंने कह दिया, यहां खाना बनने में देर हो जाएगी। इसलिए पूजा करके हम भी तुरंत घर को आते हैं, आप लोग तब तक वापस चलो, क्योंकि वापस चलने में देर हो जाएगी। ग्रामीण थके हुए थे, परंतु उत्साह के साथ जयकारा लगाते हुए हंसी-खुशी वापस आ गए।
बस उन्हें, अब शाम को प्रसाद वाली दावत का इंतजार था। झपरू का ने पूजा करके, पूरा सामान घर को पैक कर दिया जिसमें आध माल का स्वाद परिवारजनों ने लिया, आधा नामी-गिरामी रिश्तेदार को दे दिया। बेचारे भुरचक्के ग्रामीण हाथ मलते रह गए।
गाँव वालों को सुबह से शाम तक भूखा रखकर शाम को दो-दो पूड़ी पकड़ा कर उसके ऊपर आलू का एक खोट्टा रख दिया।
बेचारे दो दिन से पेट खाली रखे थे कि भरपेट पूड़ी- आलू और हलवा का आनंद लेंगे। गांव वालों ने बड़ी मुश्किल से भूखे पेट रात काटी, क्योंकि उनके परिवार वाले तो सो गए थे। अब आधी रात में घर जाकर अपने परिवार जनों को जगाना उन्हें ठीक नहीं लगा।
झपरू का की इस हरकत के बाद गांव वाले बड़े सतर्क हो गए हैं, अब झपरू का घर से कैसा भी निमंत्रण आए, सब अपना खाना पीना खाकर अपने घर पर समय से पहले सो जाते हैं।



