गोठ से गैरेज तक: बदलती संस्कृति और आधुनिकता की होड़

लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

गाय बांधने की जगह वाहन और घर के भीतर श्वान,
आधुनिकता की आड़ में इनका हो रहा सम्मान!

भारतीय परंपरा में घर को मंदिर की संज्ञा दी गई है। घर के बुजुर्ग कहते हैं जिस घर में गाय बंधी हो वहां कभी नकारात्मकता नहीं आती है। गाय के गोबर से आंगन लीपा जाता है, गोमूत्र से शुद्धिकरण और गोसेवा से घर में लक्ष्मी का वास होता है। लेकिन इन घरों को अब आधुनिक बना दिया जा रहा है। घर के आंगन में गाय बांधने की जगह विभिन्न प्रकार के आधुनिक वाहनों ने ले ली है। आधुनिकता की आड़ में घरों का स्वरूप ही नहीं लोगों की सोच भी बदलती जा रही है।


कभी गाँव में घर की पहचान उसके गोठ (छाना) से होती थी। डेढ़ या ढ़ाई मंजिला घर के ग्राउंड फ्लोर, मकान के ठीक बगल या आंगन के एक कोने में लकड़ी और पत्थर से बनी वह ठौर होती जहां सुबह की शुरुआत गाय के रंभाने से होती थी। महिलाएं सबसे पहले गोठ जाकर गाय को चारा-पानी देतीं और फिर घर के अंदर चूल्हा जलता था। गाय सिर्फ पशु नहीं, परिवार की सदस्य के समान थी। इनके काली, गोरी, राति, लक्ष्मी, कपिला आदि नाम दिए जाते थे। आज उस गाय के गोठ की जगह वाहन के गैरेज ने ले ली है। जहां कभी गाय के गले की घंटी बजती वहां अब बाइक और कार का हॉर्न सुनाई दे रहा है।


लोहाघाट के बुजुर्ग प्रेमानंद बताते हैं कि पहले घर में गाय का होना समृद्धि का प्रतीक माना जाता था। जिसके घर में दो-तीन गायें होतीं उसे संपन्न माना जाता। गाय के दूध से दही, घी, मट्ठा बनता। इससे मेहमानों का स्वागत होता। गोबर से घर लीपा जाता, उपले बनते और खेतों में खाद डाली जाती थी। तब गाय पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी थी। आज स्थिति उलट है लोगों के पास दो-दो लाख की बाइक और दस लाख की कार खड़ी है। पर एक गाय पालने के लिए जगह और उसकी देखभाल के लिए समय तक नहीं है। अधिकतर घरों में गाय पालना अब मुनाफे का नहीं घाटे का सौदा समझा जाने लगा है।
दूसरी तरफ एक और बड़ा बदलाव घरों के भीतर देखने को मिल रहा है। पहले जिस घर के भीतर कुत्ते का प्रवेश वर्जित माना जाता था, आज उसी घर के भीतर कुत्तों को बैठक और पलंग तक में शरण मिल रही है। पहले कुत्ता घर की रखवाली के लिए बाहर बांधा जाता था, उसे सबके खाने के बाद रसोई का बचा-खुचा खाना दिया जाता था। आज विदेशी नस्ल के कुत्ते इसी घर के सदस्य बन गए हैं। पालतू कुत्तों के लिए अलग बिस्तर, साबुन, बिस्किट और डॉक्टर तक का पूरा इंतजाम सबके पास है।


बाराकोट के मोहन दा कहते हैं, “यह बदलाव सिर्फ घर का नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का है। हमने गाय को इसलिए छोड़ा क्योंकि वह मेहनत मांगती है। उसे जंगल ले जाकर चराना पड़ता है, दिन में तीन बार पानी पिलाना पड़ता है, रात-दिन चारा खिलाकर उसकी सेवा करनी पड़ती है। जबकि कुत्ता स्टेटस सिंबल बन गया है। कुत्ता साथ घुमाने से आधुनिकता दिखती है।”
इसका असर गाँव के खेतों और रिश्तों पर भी पड़ा है। जब घर में गाय थी तो खेत में गोबर था, गोबर भरपूर रहता तब खेत उपजाऊ रहते थे। तब रासायनिक खाद की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। आज गोबर नहीं है तो यूरिया-डीएपी से खेत भर दिए गए हैं। इसके चलते उपजाऊ जमीन और बंजर होती जा रही है। पहले गाय के बहाने ही सही तब परिवार सुबह चार बजे उठ जाता था। घर के सदस्य मिलकर गाय को नहलाने-धुलाने से लेकर चारा देने का काम करते थे। अब गैरेज में खड़ी गाड़ी को सिर्फ चाबी लगाकर स्टार्ट करना है। साथ मिलकर काम करने की परंपरा खत्म हो गई है।

इस संबंध में चंपावत की बुजुर्ग गायत्री देवी का कहना है पहले जब घर में गाय थी तो बच्चे भी उससे जुड़े रहते थे। उन्हें पता था कि दूध कहां से आता है। आज शहर के बच्चों को लगता है दूध दुकान से बनता है। हमने अपने बच्चों को जानवरों से प्रेम करना भुला दिया है। गाय को हमने सड़क पर बेसहारा छोड़ दिया और कुत्ते को बैठक और बेडरूम में लाकर आरामपसंद बना दिया है।

बहरहाल आजकल लोगों के मकान पहले से बड़े और चमकदार बन रहे हैं। लेकिन उनमें अब न गाय के गले की घंटी की आवाज है और न गोबर से लिपे आंगन की महकती खुशबू ही शेष बची है। दो-तीन मंजिला कंक्रीट के मकान के आंगन में नाना प्रकार के दोपहिया और चौपहिया वाहन खड़े हैं और घर में चौकीदारी के लिए रखे सफेद, काले, भूरे कुत्ते ठंडे कमरों के भीतर आराम फरमा रहे हैं। आज अधिकांश लोगों के पास आलीशान मकान तो हैं पर बीते दौर के संयुक्त घरों जैसा कुछ शेष नहीं बचा है।

Spread the love
Scroll to Top