जाला

लेखक: रमेश चम्पत

सुरेश और दिनेश लगभग साल भर बाद आंगन के चारों तरफ बनी चौड़ी दीवार पर बैठे हुए थे।आंगन के चारों ओर चारदीवारी बैठने के लिए ही की गई थी। कल ही अम्मा का वार्षिक श्राद्ध हुआ था। मां के आग्रह पर ही दीवार की चौड़ाई दो फीट और ऊंचाई तीन फीट बनाई थी, ताकि लोग उसमें पालथी मारकर बैठ सकें, या पैर लटकाकर कुर्सी की तरह बैठ सकें। बस दोनों बैठे ही थे, बातचीत के लिए कोई विषय भी नहीं था। सारे मेहमान निपट गए थे,काम करने को कुछ भी नहीं था। पहले सुरेश आया और उस दीवार पर पालथी मारकर बैठ गया। भाई को बैठा देखकर दिनेश भी आया और तकरीबन तीन चार फीट की दूरी पर पालथी मारकर वह भी बैठ गया।
दिनेश बाहर शहर में नौकरी करता था ,अम्मा के वार्षिक श्राद्ध से पांच दिन पहले ही गांव आया था । जबकि सुरेश दूसरे छोटे से कस्बे में शिक्षक था, उसका आना-जाना गांव से ही हो जाता था।दोनों भाइयों की उम्र में भी बहुत अंतर था, इसलिए सामान्य बातचीत कम ही होती थी। प्रायः सुरेश ने जो कह दिया दिनेश उसमें तर्क़ वितर्क नहीं करता था और उसकी बात मान लेता था इसलिए आज भी दोनों के बीच में बात करने को कुछ नहीं था। बस दोनों चुपचाप बैठे थे। दोनों के ही मन में है अम्मा की पुरानी यादें उमड़ घुमड़ रही थी। लगभग आधे घंटे बाद अचानक दिनेश ने कहा दादा, अब बीच का जाला बंद कर देते हैं। सुरेश एकदम से चौंक गया, और धीरे से कहा “जैसी तेरी इच्छा”‌। सुरेश यादों के समुन्दर में उतर चुका था । दिनेश की इस बात ने उसे लगभग तीस साल पीछे पहुंचा दिया।
सुरेश को हाईस्कूल के दिन याद आ गए जब प्रैक्टिकल हो रहे थे, अपने पिताजी की दवाईयां कस्बे से लाकर घर पर देने के बाद , आपाधापी में स्कूल पहुंचना। देरी से पहुंचने पर अध्यापक और एक्जामिनर द्वारा एक साथ फटकार लगाना, आंसू में डबडबाई आंखों से दोनों को देखते हुए उत्तर पुस्तिका ले जाकर प्रैक्टिकल लिखना।
जब एक्जामनर वाएबा ले रहे थे, तभी गांव का एक व्यक्ति दौड़ कर अध्यापक के पास आता है, कुछ खुसरपुसर होती है, एक्जामिनर ने सर हिलाकर अपनी सहमति दे दी थी। गांव के व्यक्ति को अपने स्कूल में आते ही सुरेश मन ही मन अनहोनी की आशंका से भर गया था। इसलिए उसने कुछ पूछताछ भी नहीं की, और सीधे उनके साथ गांव को चला आया।
गांव में एकदम सुनसानी थी, और गांव के लोग सुरेश के घर के बाहर इकट्ठा थे, सुरेश के समझने के लिए कुछ भी बाकी नहीं था।छोटा भाई दिनेश जो पांच साल का था, बार बार पिताजी को “ओ बाबा उठ ” संबोधित कर जोर जोर से रो रहा था । सुरेश जानता था, अब पिताजी को नहीं उठना है,आंखों से बरसती निरंतर आंसूओं की धारा लिए मां बेसुध सी एक तरफ पड़ी थी । ” उठ बठ्यौ आपन मालिक हन, त्वे कै इन नानतिनां कि थै दड़ हुन पड़लो”(अपने पति को अंतिम यात्रा की विदाई दे, तूझे इन बच्चों के लिए मजबूत बनना पड़ेगा)। आज भी ये आवाज उसके कानों में गूंज जाती थी ,जो गांव के सयानों ने उस वक्त सुरेश की मां से कही थी।
मां वास्तव में दृढनिश्चयी थी। पीपलपानी के अगले दिन ही बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई थी, सुरेश की तैयारी नहीं हो पाई थी, उसका परीक्षा देने का मन भी नहीं था।मगर मां की डांट खाकर अनमने ढंग से सुरेश तैयार हो गया । मां ने सारा सामान बांध दिया था जो उसके एक माह की अवधि की बोर्ड परीक्षाओं के लिए आवश्यक था, और जाते-जाते मां ने सख्त स्वरों में हिदायत भी दे दी थी ,कि “अब रोना धोना नहीं करना है, तेरे लिए तो मैं हूं ही”। मां के साथ छोटा भाई भी उसे कच्चे रास्ते से सड़क तक छोड़ने आया था।मां का दृढ़ निश्चय था कि सुरेश की पढ़ाई नहीं रूकेगी, भले ही परिश्रम कितना ही करना पड़े। परिणामस्वरूप सुरेश सारी बाधाओं को पार कर स्नातकोत्तर कर गया , और इधर दिनेश भी इंटरमीडिएट में पहुंच गया।
मां पार्वती देवी की कठिन परीक्षा का दौर अब बीत चुका था क्योंकि सुरेश अब गांव के पास ही कस्बे के राजकीय विद्यालय में अध्यापक हो गया था। इस बीच मां सारी जिम्मेदारियां उठाते हुए वास्तविक दुनियादारी से पूर्ण रूप से परिचित हो चूकी थी। रिश्तेदारों द्वारा सुरेश की शादी के लिए आग्रह करने पर सख्ती से मना कर दिया । मां का कहना था कि पहले गांव में दोनों के लिए ठीक ठाक मकान बना लेना उचित रहेगा। शादी हो जाने के बाद सुरेश की घरवाली का व्यवहार न जाने दिनेश और मेरे प्रति कैसा हो ?
सुरेश ने मां की बातें कहां टालनी थी, उसने अपनी पहली तनख्वाह आते ही मकान का काम शुरू कर दिया। उसने मकान में दोनों साइड दो-दो कमरे और रसोई एवं शौचालय का निर्माण करवा दिया। मकान में दो सेट अलग होते हुए भी मां ने दोनों सेटों के बीच में आगे वाले कमरे में छाती की ऊंचाई पर दो पत्थर निकलवा कर जाला बनवा दिया था।
सुरेश की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि मां ऐसा क्यों कर रही है ? इससे पूरे कमरे की शोभा खराब हो रही ‌‌।वह जाला मात्र इतना बड़ा था कि जिसमें केवल दूध का भगौना या इससे छोटी चीज ही आर पार जा सकती थी। यहीं पर सुरेश और दिनेश मां से राजी नहीं थे। उनका कहना था कि अगर मां की इच्छा ही है तो इसमें दरवाजा ही बना देते हैं खाली जाला क्यों छोड़ना है ?
सुरेश ने पूरे जीवन मां के संघर्षों को देखा था, इसलिए उसमें इतना साहस भी नहीं था कि वह मां की बात का विरोध कर सके। दिनेश काफी लंबे समय तक मां के साथ रहा था इसलिए वह जिद्दी भी था। उसने मां से आग्रह किया कि जब ददा मना कर रहा है, तो वे उसकी बात क्यों नहीं सुन रही है। मां ने डपटते हुए कहा, यह जाला में अपने लिए बना रही हूं। मेरे लिए क्या तुम दोनों इतना भी नहीं कर सकते हो? अब दिनेश भी चुप था, लेकिन जाले का महत्व उसकी समझ से परे था।
मकान बनते ही मां ने एक साइड दिनेश के, और एक साइड सुरेश के हवाले कर दी थी । अपनी घोषणा मां ने कर दी थी कि वह दिनेश की तरफ ही रहेंगी, क्योंकि दिनेश अभी पढ़ाई कर रहा था, और शहर भी जाता रहता था इसलिए अधिकांश समय मां ही उसकी तरफ रहती थी।
अब मां ने रिश्तेदारी में से ही एक अच्छी सी लड़की ढूंढ कर सुरेश की शादी कर दी थी। शादी होते ही, सुरेश को जाले का महत्व समझ में आ गया था, उसकी मां अनपढ़ अवश्य थी परंतु सामाजिक दूरदर्शिता बहुत अधिक थी।
पर्वतीय मूल का होने के कारण सुरेश जाले का महत्व धीरे-धीरे समझने लगा था। सुरेश की पत्नी पढ़ी लिखी थी, लेकिन गांव की मान्यताओं का विरोध झेलने का साहस सुरेश और उसकी पत्नी में नहीं था।
अब सुरेश को ध्यान में आ रहा था कि कैसे गजबज का पानी पीकर एक दिन पूरा गांव ही औतर गया था, और जिसके यहां से यह गजबज हुई थी, उसके पूरे परिवार को ही देवता का प्रकोप झेलना पड़ा। सुरेश को ध्यान में आ रहा था कि कुछ लोग तो गजबज से पीड़ित थे, कुछ उस परिवार से रंजिश रखने वाले उछल उछल कर औतर रहे थे, ताकि उस परिवार को समाज, बिरादरी या देवता के सामने दंडित किया जा सके।
शादी के पहले पीरियड में होने वाले धार्मिक संस्कारों का होश भी सुरेश को नहीं था, लेकिन मां की दूरदर्शिता ने लाज बचा ली। पढ़ी लिखी बहू सीधे किचन में चली जाती, और टांयलेट बाथरूम हेतू बाहर जाने का तो कोई मतलब ही नहीं था। अगर मां, अन्य गांव के लोगों की तरह दिन भर बहू के पीछे पीछे गोमूत्र छिड़कती रहती , तो घर में क्लेश होना स्वाभाविक था।
मां ने रीति रिवाज के दिनों के दौरान जाले से ही दोनों को खाना सरका दिया। मां दिन में मेहमानों को अपनी तरफ बैठा लेती जिससे कोई भी ऐसा प्रश्न सुरेश और उसकी बीबी के प्रति खड़ा ना हो।सुरेश मन ही मन मां की समझदारी का आभार व्यक्त कर रहा था। । शुरू में सुरेश की पत्नी ने भी सुरेश से प्राइवेसी का वास्ता देकर जाला बंद करने हेतु अनुरोध किया था। परंतु सुरेश ने असमर्थता जता दी थी। इस कारण पत्नी ने बार बार जिक्र करना सही नहीं समझा।
अब सुरेश की पत्नी भी गांव की अन्य महिलाओं की स्थिति देखती, और पीरियड में उनके परिवार द्वारा उनके साथ होने वाला भेदभाव देखती थी और अपनी स्थिति से तुलना करती तो सास के साथ साथ उस जाले से भी उसे प्रेम हो गया था।
सुरेश की बीवी की डिलीवरी के बाद जाले का महत्व अत्यधिक बढ़ गया। सुरेश की बीवी सास के साथ साथ जाले के प्रति भी कृतज्ञ थी, कारण रात को बच्चे की रोने आवाज सुरेश की मां को जाले से साफ सुनाई देती थी। सुरेश की घरवाली के उठने तक सुरेश की मां कटोरे में दूध गरम कर जाले में रख देती, और सुरेश बोतल में भरकर अपनी घरवाली के पास दे देता। सुरेश मां की दूरदर्शी सोच से गदगद था। इधर दिनेश की पढाई भी पूरी होने लगी थी, मां के अस्वस्थ होने या अन्यत्र जाने पर यही काम दिनेश कर देता था।
जब स्टाफ में अन्य लोगों से बच्चे के कारण रात को नींद न आने जैसी परिस्थिति का हवाला दिया जाता तो सुरेश का मन मां के प्रति कर्तज्ञता से भर जाता था,और उसे अपनी सोच पर शर्म आती कि जब वह सोचा करता था कि मां अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने के लिए दीवार पर जाला बना रही है। दिनेश की नौकरी शहर में किसी कंपनी में लग चुकी थी, मां ने उसकी भी शादी कर दी ।
सुरेश ने दिनेश की शादी में बड़े भाई का फर्ज़ निभाते हुए हैसियत से बढ़कर ख़र्च किया था। अब मां ने अपना ठिकाना दीवार के दूसरी तरफ सुरेश के आगे वाले कमरे में बना लिया। वही सारी प्रक्रियाएं दीवार के दूसरी तरफ से दिनेश की पत्नी लिए भी पूरी की गई। अब दिनेश भी मां के बनाए जाले का एहसान मंद था।
सुरेश का बच्चा दस साल बड़ा हो चुका था , सुरेश ने उसे अच्छी शिक्षा हेतु हांस्टल में भेज दिया था। दिनेश के संतान होते ही,घर में फिर किलकारियां गूंज उठी। अब सुरेश भी मां के साथ साथ जाले के पास खड़े होकर बच्चे से तोतली भाषा में बात करता। सुरेश स्कूल आने और जाने के समय कम से कम आधा घंटा जाले में सिर टिकाकर बच्चे से बात करता रहता था।
दिनेश की कंपनी प्राइवेट थी, कंपनी से आने के बाद खाना बनाना दिनेश के लिए कठिन हो जाता था। मां भला अपने बच्चे को कैसे कष्ट में देख सकती है? दिनेश द्वारा एक बार जिक्र करने भर से मां ने उसकी पत्नी को उसके साथ शहर भेज दिया। और मकान की देखभाल हेतु वह फिर दिनेश की साइड रहने लग गई। सुरेश भी भाई की परिस्थिति को समझता था इसलिए उसने कोई अवरोध पैदा नहीं किया। अब पत्नी का बनाया हुआ भोजन सुरेश जाले में रखकर मां को आवाज देता था। और सुबह के समय सुरेश की पत्नी चाय बनाकर जाले में रखकर सास को आवाज देती थी।
एक दिन सुरेश के जाले मैं खाना रखकर आवाज देते ही मां ने हंसते हुए कहा ,”देख, मेरा बनाया जाला अब मेरे काम लग रहा है ” ।सुरेश ग्लानि से कुछ नहीं बोला। एक दिन सुबह जब सुरेश की पत्नी ने चाय रखकर सास को आवाज दी तो वहां से कोई उत्तर नहीं आया। सुरेश भी तीस साल पहले दिनेश की तरह मां को बा- बार “ओ ईजा उठ ” रोते हुए करूण स्वर पुकार रहा था। लेकिन अब मां नहीं सुन रही थी।
सुरेश अतीत की यादों में खोते खोते सिसकी लेने लगा था।उसका ध्यान अचानक दिनेश की सिसकियों से टूटा।
आधा घंटे बाद चुप्पी तोड़ते हुए दिनेश ने फिर पूछा, ददा! मैं जाला बंद करने के लिए पूछ रहा हूं। सुरेश ने बिना उसकी तरफ देखे हुए एक हजार रूपये बढ़ाए, और रूंधे गले से भर्राई हुई आवाज में कहा ” एक घंटे के लिए मिस्त्री ,चार छह ईट और थोड़ा खुला सीमेंट ले आना “। अब बाजार जाने की हिम्मत दिनेश में नहीं थी,फफक फफक कर रोते हुए बोला ददा “नानितीन जां बनाल मकान आफी बनाल, हम ये जालो बंद ना करना” ( बच्चे अपने लिए जहां चाहे वहां मकान बना लें, हम ये जाला बंद नहीं करेंगे)। सुरेश ने भी रोते हुए अपनी मौन सहमति दे दी।

                                                                                                                              - रमेश चम्पत

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