ब्रह्म दत्त तिवारी का लड़का महेश सजाना हो गया, उसके साथियों में कुछ ही लोग अबेवा (जिसकी शादी नहीं हुई हो) रह गए। इस कारण ब्रह्म दत्त तिवारी थोड़ा सा परेशान रहते थे। गांव में भी चर्चाएं होने लगी कि बरमका अपने लड़के की शादी नहीं कर पा रहे हैं।
बरमका अपनी हैसियत और सामर्थ्य के हिसाब से पचास जगहों पर हाथ पैर मार चुके थे। कुछ जगहों पर बात ठीक ठाक बनी, लेकिन बरमका की उन जगहों पर पुरानी रिश्तेदारी थी, उन्हीं लोगों ने बरमका के लड़के की खोटी कर दी थी । 😂
फलस्वरूप बात बनते बनते रह गई। बरमका ने उन रिश्तेदारों से बोलना छोड़ दिया, उनके यहां न्यूत में आना जाना भी छोड़ दिया। गांव में कहीं भी शादी होती तो बरमका लड़के का भी जिक्र वहां पर हो जाता था। ऐसा होने पर बरमका और उन्की पत्नी के लिए बड़ा औसान हो जाता था। थक हार कर बरम का प्रभु की इच्छा मानकर चुप बैठ गए। 😌
गांव में एक मंगपत्या हरिका भी थे, जिन्होंने अपनी तिकड़मों से गांव के कई निठल्ले और नकारे लड़कों की शादी अच्छे-अच्छे घरों से करा दी थी। उनके परिवारजन आज भी हरिका को दंडवत प्रणाम करते हैं। परंतु जिन ससुरालियों से उन लड़कों की शादी हुई थी उन गांव वालों ने हरिका को बायकाट कर रखा था।
आज भी किसी गांव में हरिका का प्रवेश हो जाता था, तो गांव वाले चिल्ला कर कहते थे “आज सो हरिया आब जै कि खोरी फोड़नै हन लागि रौ, आई कै कि चेली सटपट हन आ गौ”(आज हरीश किसका नाश करने जा रहा है)।
😂😌 अर्थात हरिका का प्रवेश किसी भी गांव में इस बात का संकेत होता था कि वह कहीं न कहीं मंगनी के लिए ही जा रहे होंगे। यह उन पिताओं का भड़ास निकालने का एक तरीका होता था, क्योंकि रिश्तेदारी तो हो गई थी अब वह हरिका का बहुत कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे।
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जिन निठल्लों की शादी भले परिवारों में हरिका अपनी तिकड़मों से करवा चुके थे। उनकी शादी कराने में अंबानी और अडानी के भी पसीने छूट जाते। हरिका की उन परिवारों में हमेशा ऐसी ठाठबाट की दावत होती थी । जैसे नए जमाई की शुरू दिन अपनी ससुराल में। जमाई के पुराने होते ही पकवानों की संख्या में कमी आ जाती है, मगर रिश्ते किए हुए परिवारों में हरिका का जलवा सदाबहार था। उन परिवारों के लिए हरिका देवदूत से कम नहीं थे।
हरिका और बरमका के मकान के बीच का चूला(दीवार) भी साझी था ।बरमका की किस्मत पूरी ठीक थी बस यहीं पर दो इंच से मार खा रही थी।क्योंकि बरम का और हरिका की आपस में बोलचाल बंद थी। इसका कारण हरिका को बरसों पहले एक तिकड़म करके मांगजांगी में जाकर जो ब्या कराया था,उसके पुरस्कार स्वरूप मिली हुई बकरी थी। हरिका बकरी को अपने घर तो ले आए, परंतु उसका ध्यान नहीं रखा। भला तिकड़म बाज आदमी को मेहनत से खाने की आदत कहां होती? परिणाम स्वरूप बकरी ने पहले ही दिन बरमका की मेथी वाली बाड़ी चर दी, लेकिन उस दिन बरमका सहन कर गए,और हरिका को एक-आध उच्च कोटि की गाली देकर चुप बैठ गए।
हरिका अपने स्वभाव के पक्के थे ,और बकरी अपने स्वभाव की। दूसरे दिन बकरी नित्य कार्यक्रम के दौरान धनिया की बाड़ी साफ कर गई। इस बार मामला महिला शक्ति का था, बरमका की स्यूनावी, हरिका की घरवाली को झूतरी(सर के बालों का गुच्छा) पकड़ कर घरोड़ते हुए धनिये की बाड़ी दिखाने ले गई। हरिका और बरमका ने बड़ी मुश्किल से बीच बचाव किया। कुछ दिन बाद ये बात भी भूसी गई। बरम का हमेशा प्याज का ब्यूं सा करके उसके बोट गांव के किसानों को बेचते थे और उससे उनकी अच्छी आजीविका चल जाती थी। मगर हाय रे विधाता की करनी! एक दिन बाकरी(बकरी) प्याज के लम्बे चौड़े बोट जो बरमका ने छह महीने से ब्यूं (बीज)बनाने के लिए पाल रखे थे, उनको खा गई।
बस अब बरमका ने उखाड़ फटक मार दी, हरिका की घांटी निमोर के प्याज के गड़ में घैंच बेर ले आए, बड़ी मुश्किल से हरिका की घरवाली ने छुटाया। तब तक बरमका की स्यूनावी( प्यारी पत्नी ) भी आ गई , बस फिर क्या ! हरिका औ बरमका में बदा-बद (लात घूंसे)और दोनों काकीयों में झूतरा-झूतरी शुरू हो गई। 🤣🤣 । गांव वालों ने जब खूब अलारो बिलारो सुना,तब दौड़कर सब लोग आए तो मांमला शांत हुआ।
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अब पड़ोस और स्वार बिरादरी वाली बातें खत्म हो गई,और दोनों के दिल में दरार पड़ चुकी थी। लेकिन शादी के लिए आशा की अंतिम किरण हरिका में ही नजर आ रही थी। अब बरमका टूकर-टूकर रोज हरिका को आते जाते देखते थे🥹🥹।
हरिका को अपने महत्व का एहसास हो चुका था। शाम को आंगन के भीड़े में दन बिछाकर चाहा सूड़क्याते हुए बरमका को सुनाने हेतु अपनी पत्नी से कहते” अगर ये गौपन हरयै ना हून तौ, भल भल आदमी का च्याल रांडा रै जान”। पत्नी बाहर भीतर जाती हुई बिना सुने हां में हां मिलाती जाती, क्योंकि उसे पता था कि अप्रत्यक्ष रूप से गोलीबारी बरमका पर हो रही थी।बरमका ने निश्चय कर लिया था कि अब हरिका की शरण में जाना है। चार बजे से उठे हुए बरमका को सुबह के सात बजे हरिका के दरवाजों की चरचराहट सुनाई दी। बरमका दो छलांग में ही आंगन में पहुंच गए और बोले ,”है ला हरिया,!दुनिया संसार फेरी रुं छै, आपनो भतीजौ परिवार ना बनूंनै की “?हरिका ने प्रतिउत्तर दिया, कि आज से पहले आपने मुझसे कब कहा।थोड़ी देर के गिले शिकवे होने के बाद, हरिका के नेतृत्व में दोनों परिवार सटपट के लिए राजी हो गए।
मिशन सटपट शुरु हो चुका था।हरिका ने बरमका के लड़के को अपने साले के लड़के की कंपनी में जॉब करने भेज दिया था। साथ ही साले के लड़के को सख्त निर्देश दे दिए गए थे कि लड़के को तीन महीने से पहले घर नहीं आना है। भले ही उसका काम में मन ना लगे, या नौकरी छोड़ दे, किन्तु तीन महीने तक उसे अपने कमरे में ही टिका कर रखना है।इधर बरम का को कह दिया कि तीन चार क्विंटल सरिया लाकर, दो चार कट्टे सीमेंट के डालकर, दो तीन हजार ईट डालकर घर के पास वाली खाली जगह पर खुदाई शुरू कर दे। और आसपास की रिश्तेदारी में प्रचार कर दे कि लड़का गुजरात में किसी अच्छी कंपनी में जॉब कर रहा है और घर पर नया मकान बना रहा है।
बरमका की रिश्तेदारी में जोर शोर से बात फैल गई, और रिश्तेदारों के ही रिश्तेदारों के यहां से एक लड़की का रिश्ता भी आ गया।बरमका को रिश्तेदारों ने लड़की के यहां से बुलावा भेजा। अब बरमका के हाथ पैर फूल गए। वह भागकर हरिका के पास पहुंच गए। हरिका ने कहा कि आप चिंता मत करो ,बस मुंह मत खोलना, जो मैं बोलूंगा आप बस हां में हां मिलाना ।
हरिका ने अपने भांजे का दिया हुआ नया कोट पहन लिया। चित परिचित पान की दुकान में जाकर पांच रूपए में महंगे सिगरेट के दो खाली पैकेट खरीद लिए, और बरमका को दो डिब्बे सस्ती सिगरेट खरीदने लगा दिया।
खाली डिब्बों में सस्ती सिगरेट भरकर एक डिब्बा बरम का के जेब में, और एक अपनी कोट की जेब में रख लिया।हरिका ने साले के लड़के को कहकर बरम का के लड़के का अपनी बॉस के केबिन में बॉस की कुर्सी पर बैठा कर महेश कुमार जी के फोटो भी खिंचवा लिए थे और बरम का के मोबाइल में सेव करवा दिए थे।
दोनों कोट की दूसरी जेब में कुछ काजू और इलायची रखकर लड़की वालों के यहां पहुंच गए।लड़के के न आने के बारे में पूछने पर बताया कि मल्टीनेशनल कंपनी है, और आजकल काम काफी अधिक है। इस प्रकार हरिका ने सबको संतुष्ट कर लिया। और साले के बांस की कुर्सी पर बैठे हुए बरमका के लड़के का फोटो दिखा दिया। ऑफिस का शानदार फोटो देखकर रिश्ता होना लाजमी था।
सारी बात तय हो चुकी थी, शादी की तारीख भी तय हो चुकी थी। परन्तु वापसी में बरम का थर थर कांप रहे थे।घर आकर उन्होंने हरिका से कहा ,”हरिया!आब कि होलो, त्वेल तै यो घांटी में खुट रखा दे”।हरिका ने कहा कुछ नहीं होता है। “सेठ परिवार छै कुछ टैम लेक के पतो ना लागनो। चेली कै पानि पाड़या रूपाया ले तुमर मौ खा जाला” (कुछ समय तक तो तुम लोग लड़की को भेंट में मिले रूपयों से गुजारा कर लोगे)।
बाद में पत लाग जां छै ,तै द्वि चार साल नीनतनी नखानि है जांछि, (बाद में दो चार साल लड़की मायके में रहती है गुस्से में)। उती टैम तक वीक मतारी बाब मैखन गाली करला (उतने समय के लिए उसके मां-बाप मुझे गाली देते हैं बस)। फिरी तीन चार साल बाद कौला “जी हैगौ बस हैगौ , आब चेली परिवार संभाल यारौ ”(फिर कहते हैं जो होना था हो गया अब लड़की का परिवार संभाल देते हैं)।
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हरिका की दिव्य वाणी सुनकर बरमका का परिवार भी उनके आगे नतमस्तक हो गया। इधर हरिका की पत्नी भी निश्चिंत हो गई, कि जब तक भतीजे की शादी नहीं होती तब तक अपने को चूल्हे में रोटी नहीं पाथनी है।☺️☺️ बोलो हरिका की **
- रमेश चम्पत



