बंद कमरों का सन्नाटा और भीतर की उलझन

लेखक: डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी
कभी आपने पहाड़ के किसी पुराने, बंद पड़े घर की चौखट को देखा है?
जब कोई परिवार रोजगार या किसी और मजबूरी में अपने पुस्तैनी गोठ (आँगन) को छोड़कर शहर चला जाता है, तो उस बंद घर में क्या होता है?
कोई बाहर से कूड़ा फेंकने नहीं आता, कोई जान-बूझकर उसे गंदा नहीं करता। लेकिन समय बीतने के साथ वहाँ धूल की परतें जम जाती हैं, जाले लग जाते हैं और एक अजीब सी उमस और बदबू पूरे कमरों को घेर लेती है।
जो घर कभी बच्चों की किलकारियों से महकता था, वह अपने आप एक वीराने में बदल जाता है। उस घर को दोबारा रहने लायक बनाने के लिए, उसमें दोबारा रोशनी और हवा लाने के लिए किसी को अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ती है, झाड़ू उठानी पड़ती है, खिड़कियाँ खोलनी पड़ती हैं।
ठीक ऐसा ही कुछ आज हमारे युवाओं के भीतर हो रहा है।
आज का युवा मन भी एक बंद पड़े घर की तरह होता जा रहा है। बाहर से देखने पर लगता है कि सब कुछ शांत है। युवा के हाथ में एक चमचमाती हुई मोबाइल स्क्रीन है, वह दुनिया भर की तकनीक से जुड़ा हुआ है।
लेकिन उस स्क्रीन के पीछे, उस बंद कमरे के सन्नाटे में, उसके भीतर एक बहुत बड़ी उलझन चल रही है। रोजगार की तलाश का मानसिक बोझ, अपनी पहचान बनाने का दबाव और समाज की अंधी दौड़ — ये सब मिलकर युवा के भीतर एक अजीब सा खालीपन पैदा कर रहे हैं।
और इंसानी दिमाग का यह नियम है कि जब उसे सही दिशा और सकारात्मकता की ताज़ी हवा नहीं मिलती, तो उसमें नकारात्मकता और तनाव के जाले अपने आप बुनने लगते हैं।
इस खालीपन और भीतर की उलझन को दूर करने के लिए आज का युवा एक बहुत बड़ी गलती कर बैठता है। वह इस मानसिक सन्नाटे से भागने के लिए नशे का शॉर्टकट चुन लेता है।
उसे लगता है कि वह छोटी सी रासायनिक शीशी या वह धुआँ उसके भीतर के वीराने को भर देगा। लेकिन यह वैसा ही है जैसे कोई बंद घर की बदबू को मिटाने के लिए वहाँ केवल इत्र छिड़क दे। इत्र की खुशबू कुछ मिनट में उड़ जाएगी, पर भीतर की सड़न वैसी ही बनी रहेगी।
नशा युवा को उस दलदल की तरफ धकेलता है जहाँ से वापसी का रास्ता बहुत धुंधला हो जाता है।
मन का यह रण बाहर की दुनिया से नहीं है, यह खुद के भीतर जमी उस धूल और जालों के खिलाफ है।
अगर युवा को इस उलझन से बाहर निकलना है, तो उसे नशे के इस झूठे इत्र को फेंकना होगा। उसे अपने भीतर की खिड़कियों को खोलना होगा, कड़े परिश्रम और आत्म-अनुशासन की झाड़ू उठानी होगी और खुद को दोबारा व्यवस्थित करना होगा।
जब तक हम भीतर की इस सफाई के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक बाहर का कोई भी भाषण या उपदेश काम नहीं आएगा।
                                  – डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी
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