ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम कहता है —
ऊष्मा हमेशा गर्म से ठंडी ओर बहती है,
और समय के साथ हर व्यवस्था में,
एन्ट्रॉपी बढ़ती है।
एन्ट्रॉपी माने — disorderness,
एन्ट्रॉपी माने — अव्यवस्था,
माने — बिखराव, शोर, अराजकता।
और इसके उलट,
सुव्यवस्था माने — ठहराव, लय, मौन।
कहीं जीवन की गति तेज है,
वहाँ उत्सव है, उमंग है, शोर भी है,
और कहीं ठहराव है,
वहाँ तप है, मौन है, सृजन की कोर है।
तो नियम तो यही कहेगा —
गति हमेशा तेज से ठहराव की ओर बहेगी,
यदि बीच में कोई मर्यादा न रखी जाए।
इसीलिए तो पुरखों ने,
उस ठहराव के चारों ओर,
एक अदृश्य मर्यादा बना रखी थी,
कहा था — यहाँ शंख भी धीरे बजाना,
क्योंकि जहाँ मौन ही मंत्र है,
वहाँ संयम ही सबसे बड़ी पूजा है।
पर जाने-अनजाने हम,
वो मर्यादा ही भूल आए।
हम कहते हैं — हम उत्सव जगा रहे हैं,
विज्ञान धीरे से कहता है —
मित्र, तुम ऊष्मा को गलत दिशा में बहा रहे हो।
और हाँ —
ये पंक्तियाँ किसी पर नहीं,
बस खुद से एक बात है,
अगर किसी शब्द से मन दुखा हो,
तो उसे मेरी ही भूल समझना।
– डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी



