आँगन के कोने में पड़ा तख़्त,
ठूठ हुए पुलम दाड़िम के दरख्त,
नक्काश खिड़कियों से झाँकता वक़्त
पूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?
ओखली वाला सबसे बड़ा आँगन,
घुटनों चलता बीता हुआ बचपन,
नवरात्रि की रातों का जागन,
गेरू से पुते चाक का ऐपण
पूछता है , कितने दिनों के लिए आये हो?
बंज़र हुए दूर दराज के खेत,
गाय की घंटी, नदिया और रेत,
प्राइमरी स्कूल, खड़िया और स्लेट
पूछते है , कितने दिनों के लिए आये हो?
काफल बुरास का जंगल सारा,
बेमन खामोशी से बहता धारा,
सूखा हुआ देवदार पुकारा
पूछता है ,कितने दिनों के लिए आये हो?
सूनी गौशाला में पद चाप,
बैठकी होली के आलाप
दूर से आती ढोल की थाप
पूछती है, कितने दिनों के लिए आये हो?
सूखी दूब दीवारों पर जाला,
गले बँधी घुघुती की माला,
इष्ट देव के मंदिर का ताला
पूछता है,कितने दिनों के लिए आये हो?
कंफड़ जोगी के कीर्तन का चिमटा,
जगरिए की जागर और उसका हुड़का,
बूबू की अलमारी में तमाख और हुक्का
पूछते हैं , कितने दिनों के लिए आये हो?
खंडहर हुआ बडआमा का मकान,
च्यूड बनाने को कुटते हुए धान,
भूरी आँखों वाली अल्हड़ वो बान
गाड़ गधेरे के सारे भूत मशान
पूछते हैं , कितने दिनों के लिए आये हो?
मासूम आँखें वो नाज़ुक हथेलियाँ,
गोबर लिपे हुए जौं की बालियाँ,
घर के बूढ़े के चेहरे की झुर्रियाँ
पूछती हैं, कितने दिनों के लिए आये हो ?
कच्चा पैदल रस्ता सोचता है अक्सर
पक्की सड़क को दया क्यों नही आती
शहर की ओर जाती है रोज़ लेकिन
गाँव की ओर वापस क्यों नहीं आती
कितने दिनों के लिए आये हो

AI जनरेटेड सांकेतिक छवि


