आ कहीं दूर चले जएं हम दूर इतना कि हमें छूं ना सके कोई गम। किसी हिंदी फिल्म के इस गीत के बोल का बेजोड़ शब्द शिल्प आज आपके लिए बहुत कुछ कह रहा है। सचमुच गम की दुनिया से दूर कही़ं एकांत में यदि आपका बैठने का मन कर रहा है तो हम आपको बताते हैं कैसे आप इस दुनिया के जी जंजाल से छुटकारा पाते हुए कुछ सुकून के पल अपने लिए भी जीकर देख सकते हैं। इसमें एक अलग ही आनंद है जिसे परम आनंद कहते हैं। इसके लिए एक बार फिर आप को कुछ घंटे अपने जेब में रखे टच स्क्रीन मोबाइल से दूर वहां जाना होगा जहां प्रकृति आपका इंतजार कर रही है। यहीं नहीं इससे अलावा और अंदर जाकर प्रकृति से सीधा संवाद करना भी यहां जरूरी होगा।
आज दुनिया भर की सहूलियतें बढ़ने के बावजूद सुकून के पल आम जिंदगी के पन्नों से लगभग गायब हो गए हैं। तकनीक ने जिंदगी को आसान जरूर बनाया लेकिन उसी तकनीक ने इंसान से उसका ठहराव छीन लिया है। भागदौड़ भरी जिंदगी में आज हर चेहरा जल्दबाजी में है। उसका हर कदम रोजमर्रा की मैराथन दौड़ में शामिल है। इसके इतर सकून भरे पल जीने के लिए मन एक बार फिर आपाधापी भरी जिंदगी से दूर प्रकृति के और नजदीक तक पहुंचना चाहता है।
आज से करीब दो तीन दशक पूर्व तक ही पहले तक की जिंदगी में संसाधन कम थे लेकिन रिश्तों में गर्माहट रहती थी। शाम होते ही आंगन और चबूतरे में चौपाल सज जाती थी। गांव केआंगन में परिवार जुटता और आस पड़ोस के सुख-दुख बंटता था। आज उसी आंगन में हर हाथ में मोबाइल है, हर नजर स्क्रीन पर है। पास बैठे लोग भी दूर हो गए हैं। आज सुबह आंख खुलते ही मोबाइल की स्क्रीन, नोटिफिकेशन की भरमार, दिनभर ऑफिस का दबाव, ट्रैफिक की होड़ और शाम तक थका देने वाली भागमभाग में लोगों का जीवन बीता जा रहा है। दिन भर की इस दौड़ में इंसान सिवाय खुद के लिए दो पल सुकून के और सबकुछ कुछ प्राप्त रहा है। आज घर के बूढ़े-बुजुर्ग कहते हैं पहले जेब खाली थी पर मन भरा रहता था और आज जेब भरी है पर मन खाली हो गये है। युवा पीढ़ी करियर, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की होड़ में बेचैनी इस कदर दौड़ रही है कि ठहर कर जीने का एहसास ही पीछे छूट गया है। लोगों को नींद पूरी तरह छिनी नहीं है पर चैन आराम कही नहीं है।
आज लोगों का घर आधुनिक सुविधाओं से भरा है पर आपस में बात कम हो रही है। इसको लेकर मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह सिर्फ समय की कमी नहीं है बल्कि प्राथमिकताओं के बदलने का संकट है। आज आम जन को सुविधा ने गति दी है पर बदले में शांति और सुकून की कीमत उससे ले ली है। इस अवसाद से बचे रहने के लिए जरूरत है कि व्यस्त जिंदगी के कुछ पल खुद के लिए भी निकाल लिए जाएं और दूर कहीं पेड़ की छांव में बैठकर प्रकृति से सीधा संवाद किया जाए। क्योंकि अंत में यही ठहरे हुए सुकून भरे पल ही असल में जिंदगी के मायने बताते हैं।
– ललित मोहन गहतोड़ी



