असोज : शुरू हुई घास कटाई की पारंपरिक मुहिम, मशीनीकरण ने भी दी रफ्तार

लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

पहाड़ में असोज लगते ही शुरू हुआ घास कटाई का कार्य, मशीन से भी हो रही अब घास कटाई, साल भर के लिए पशु चारे का इंतजाम, सुखाकर डालते हैं लुट्टा, पलायन से मांगों में सूख रही घास

असोज का महीना शुरू होते ही पहाड़ के गांवों में घास कटाई शुरू कर दी जाती है। पहाड़ी जनजीवन शैली की यह पुरानी और महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है। पूरे साल भर पशुओं के चारे की चिंता से मुक्ति के लिए पशुपालक इस महीने में घास के पौड़ों (घास के मैदानों) और ढ़लान वाले मांगों से घास काटते, सुखाते और फिर लकड़ी के लंबे लट्ठों से बने लुंगरों में लुट्टा डालते हैं। यही घास का लुट्टा आगे सर्दियों और गर्मियों में पशुओं के लिए वर्ष भर की जीवन रेखा बनता है।

असोज से पहले माह भादो तक घास को बढ़ने दिया जाता है। इस दौरान मांगों की घास पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। अधिकांश जगह पर असोज के पहले सप्ताह से घास कटाई शुरू होती है। कुमाऊं के चंपावत, लोहाघाट, पाटी, बाराकोट, देवीधुरा, मंच और पंचेश्वर सहित ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इन दिनों सुबह से ही घसियारी महिलाएं और पुरुष दराती लेकर घास काटने निकल पड़े हैं। पल्ट परंपरा का निर्वहन करते घसियारियों को दिन भर घास काटनी पड़ती है। कुछ लोग अब मशीन का भी इस काम में प्रयोग करने लगे हैं।

पशुओं के लिए घास काटना (घास काटण) बेहद मेहनत भरा काम है। पहले घास को काटा जाता है, फिर उसे वहीं खेत या मांग में 2 से 3 दिन तक फैलाकर सुखाया जाता है। सूखने के बाद इसे इकट्ठा कर सिर पर या पीठ पर रखकर घर तक पहुंचाया जाता है। घर के आसपास ही दो बड़े पेड़ों या लकड़ी के मजबूत लट्ठों का लुंगरा खड़ा किया जाता है। इसमें सूखी घास को इस तरह से रखा जाता है कि वह साल भर खराब न हो और बारिश में भी न सड़े। लुट्टा डालना भी एक कला है, जो नई पीढ़ी धीरे-धीरे भूलती जा रही है।

बुजुर्ग माधवानंद बताते हैं कि पहले गांव के हर परिवार में 5 से 7 पशु होते थे। इसलिए घास का महत्व अनाज से भी ज्यादा माना जाता था। जिसके घर में जितना बड़ा घास का लुट्टा होता उसे उतना ही संपन्न माना जाता था। पशुपालक गोपाल सिंह बताते हैं कि असोज में काटी गई घास सबसे पौष्टिक मानी जाती है। इसे खाने से पशु स्वस्थ रहते हैं और दूध भी अधिक देते हैं। सर्दियों में जब बर्फबारी होती है और चारों तरफ हरियाली खत्म हो जाती है, तब यही सूखी घास पशुओं का सहारा बनती है। लेकिन बदलते समय के साथ इस परंपरा पर भी पलायन की मार पड़ रही है। गांवों से लगातार हो रहे पलायन के चलते अब घास काटने वाले हाथ कम हो गए हैं। चंपावत जिले के कई गांवों में तो स्थिति यह है कि घास के मांगों में खड़ी घास बिना कटे ही सूखकर बर्बाद हो रही है। पहले जहां एक-एक मांग में 20-25 परिवार घास काटते थे, वहीं अब 4 से 5 परिवार ही बचे हैं। पाटी से लेकर बाराकोट के कई गांवों में सैकड़ों कुंतल घास यूं ही मांगों में सूख रही है।

बुजुर्ग महिला रेवती देवी का कहना है खेती और पशुपालन छोड़ने से घास का महत्व भी कम हो गया है। नई पीढ़ी शहरों में नौकरी करना पसंद करती है उसे घास काटने जैसा कठिन काम अच्छा नहीं लगता है। वहीं गांवों में जंगली जानवरों का आतंक भी इसका एक बड़ा कारण रहा है। घास के मैदानों में असमय बाग और भालू का डर बना रहता है, इससे महिलाएं अकेले मांगों में घास काटने जाने से कतराने लगी हैं।

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है, लेकिन बढ़ते पलायन के चलते लाभार्थी यहां अपेक्षाकृत कम पहुंचते हैं। सामाजिक चिंतकों की मानें तो जब गांवों में लोग नहीं रहेंगे तब तक यह परंपरागत ज्ञान और घास के विशाल मांगे बेकार ही रहेंगे। देवीधूरा के पशुपालक राजेश बिष्ट का कहना है पलायन को रोकने के साथ-साथ पशुपालन को रोजगार से जोड़ना बहुत जरूरी है। ताकि पहाड़ के यह हरे-भरे मांग फिर से आबाद हो सकें और असोज की घास कटाई की रौनक फिर से गांवों में लौट सके। गांवों से पलायन के चलते मांगों की अधिकतर घास आज मांगों में ही सूखी नजर आ रही है।

बदलते दौर में मशीनीकरण ने हर जगह हस्तक्षेप कर दिया है। घसियारियों का काम भी अब मशीनों ने छीन लिया है। हाथ में दराती लेकर पड़म (पल्ट) के साथ ऋतु गीत गाते गुनगुनाती महिला घसियारियों की घास कटाई में जो रौनक बरसती थी। पहाड़ में भी घास कटाई के काम में अब मशीन का प्रयोग किया जाने लगा है। पेट्रोल से चलने वाली आधुनिक घास कटर मशीन से एक घंटे में दो-तीन बड़े-बड़े घास के खेत काट लिये जा रहे हैं। कुछ स्थानीय पुरुष घस्यार इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाते हुए मशीन के साथ घास कटाई का काम कर रहे हैं। यह घास कटार लोग घंटे के हिसाब से 300 से 500 रुपए तक लेकर महीने भर की घास कटाई का काम कुछ दिनों में पूरी कर जा रहे हैं।

– ललित मोहन गहतोड़ी

AI जनरेटेड सांकेतिक छवि
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