बीद

लेखक: रमेश चम्पत

बारिश धीमे होते ही बाहर निकल आता हूं मैं, इसी को हमारे यहां बीद होना कहते हैं। मित्रो हिन्दी भाषा में ऐसा कोई शब्द हो तो अवश्य बताना। बीद इस बात की गारंटी नहीं होती कि मौसम साफ ही होगा।
हल्की हल्की फुहार कभी कभी आती रहती हैं। हमारे यहां बीदा होने के बाद घाम आएगा निश्चित नहीं है, द्यो दुबारा घड़की सकता है।
हां बीद में हमारे आवश्यक कार्य निपट जाते हैं। जैसे एक सास दूसरी सास से मिलकर मन की भड़ास निकाल लेती है।

पालतू जानवरों के पास चारा पहुंच जाता है। जिसे हम लोग गोठ पातै बुती कहते हैं, अर्थात वापसी में गृहणी दुध ले आती है। बच्चे भी एक दो राउंड कूद फांद लेते हैं। आज मैंने ध्यान से सोचा कि हे भगवान अगर ये बीदा नहीं होता तो उन पतियों का क्या होता जिनकी पत्नियां चौबीसों घंटे सिर पर सवार रहती हैं। कुछ लोग बिना बारिश रूके ही “बीद हो गया” चिलार मचाते हुए बाहर को दौड़ते हैं, यह एक प्रकार का संकेत होता है पड़ोसी के लिए, क्योंकि पार्टी का स्थान व समय तो पहले दिन ही तय होता है।

इस बीदे की अहमियत उससे पूछो जनाब, जो ससुराल गया होता है, सास के आगे बैठना, रजत शर्मा के ‘आपकी अदालत’ से भारी पड़ता है, जैसे ही बीदा हुआ, दामाद गोली की रफ्तार से फरार।
ये बीद लोग अपनी सुविधानुसार नकारते और स्वीकारते हैं। कहीं काम चल रहा हो ठेकेदार बीदा हो गया स्वीकारता है, परन्तु मजदूर नकारते हैं। यानि अपने अपने दृष्टिकोण पर आधारित है।

प्रायः झड़ होने अपने बामन ज्यू का बीदा मोटे और हल्के जजमान के अनुसार होता है। जजमान मोटा है तो बीद जल्दी हो जाता है, अर्थात बारिश कम होने का पूर्वानुमान लगाकर जजमान के घर की तरफ दौड़ लगा देते हैं।
परन्तु जजमान हल्का है तो बीदा थोड़ी देर से होता है, यानि बीदा होने देते हैं, परन्तु बीदा होता अवश्य है। जजमान निश्चिंत रहता है कि बीदा होगा और बामन ज्यू अवश्य आएंगे।

फल सब्जी और दूध विक्रेताओं के लिए यह बीदा वरदान सरीखा होता है, क्योंकि ग्राहक के पास चीजों को परखने के लिए समय ही नहीं होता है। वह पैसे का अधिक मोलभाव किए बिना, सामान लेकर घर पहुंचकर ही अपने पराक्रम का बखान करना उचित समझता है। वस्त्र विक्रेता, अधखुली दुकान में आधी नींद में पड़े रहते हैं। उनको पता रहता है अब दुकान में कम ही लोग आएंगे, जो आएंगे तो बिना सामान लिए नहीं जाएंगे।
वहीं परचून के दुकानदार इस बीदे से आतंकित रहते हैं, ये अलग बात है कि वह अपने चेहरे के मनोभावों को छुपा लेते हैं। इसका कारण बीदे में उधार फंसने की संभावना बहुत रहती है।

पार्टी वाले भाई बन्धु इशारों में बता कर स्वयं ही नमकीन चूड़ ले जाते हैं (बेतरतीब ढंग से पैकेट लड़ी में से फाड़ना), जिसके कारण लड़ी में क्रम से लगे दूसरे पैकेट का सत्यानाश हो जाता है, और दुकानदार नमकीन के पैसे अगले दिन मांगने में संकोच करता है, क्योंकि बंधा हुआ ग्राहक टूटने की संभावना रहती है। कुछ लोग तेंदुए की तरह आते हैं अपने उद्देश्य के सामान में झपट्टा मारकर पैसे खाते में लिख देना बोलकर दौड़ जाते हैं। अगर इनमें से किसी एक का भी सामान खाते में दर्ज करना भूल जाता है, तो उसका कम से कम दो चार घंटे का मुनाफा तो चला ही जाता है।

वहीं बच्चों की सेना भी बीदे का मौका देखकर पांच दस रूपये लाकर उसके काउंटर से लटक जाती है। यदि बंदर सेना को प्राथमिकता देकर सामान नहीं दिया तो दो-चार सामान की टूट- फूट अवश्यंभावी हो जाती है। बच्चों के लिए क्रोध करने पर यदि वह रोते-रोते वह घर चले गए तो तुरंत की प्रतिक्रिया में उनकी पूजनीय माताओं का बिना मेकअप के रौद्र रूप देखना दुकानदार के लिए असहनीय हो जाता है। उसकी सारी दूकानदारी अवतरित हुई देवियों को मनाने में चली जाती है। वह प्रभू से प्रार्थना करता है, हे प्रभू !बरखा आती है आए, घाम आता है आए। लेकिन बरखा, फिर बीद, फिर बरखा, फिर बीद, इस चक्कर से बचा ले।

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