अपना ओहदा शहर में छोड़कर गांव पहुंचिए, बिरादरी में एटीट्यूड नहीं चलता यहां आज भी अपनेपन का राज है।
आप बाहर जाकर कितने बड़े अधिकारी बन जाओ, कितने बड़े नेता, पत्रकार, अध्यापक और बिजनेसमैन बन जाओ गांव वाले आपको वही समझेंगे जो समझ आपको लेकर उनकी नजर में बनी हुई है। यह पहाड़ का एक अलिखित नियम है।
आपने अक्सर देखा होगा कि शहर में बड़ी कुर्सी पाने के बाद लोग गांव लौटते हैं तो काला चश्मा, सूट-बूट, बड़ी गाड़ी और रुतबा जमाते दिखाई देते हैं। लेकिन गांव की चौपाल में उनका यह रुतबा कुछ सेकंड नहीं चलता, लोग सीधे उनसे कन्नी काटते हुए दूरी बना लेते हैं। जिस आंगन में आप नंगे पांव खेले हो, जिस धारे पर गांव वालों के साथ पानी पिया हो, वहां के लोग आपकी डिग्री नहीं, आपका व्यवहार देखते हैं।
गांव के बुजुर्ग सही कहते हैं, गांव से बाहर सबको आप अपने धन, शानो-शौकत और ओहदे से प्रभावित कर सकते हो, पर उन ग्रामीणों को नहीं जिनके साथ आप लुका छिपी, संपोलिया और पारंपरिक गिल्ली-डंडा खेले और उठे-बैठे हो। वहां जरा भी एटीट्यूड दिखा तो आपकी मजाक बनते देर नहीं लगती – “देखो आ गया लाट साहब !”
इसलिए समझदार लोग जब गांव आते हैं तो अपनी योग्यता और उपलब्धि को अपने कर्मस्थल में ही छोड़कर आते हैं। गांव में वही भोला-भाला ग्रामीण बनकर मिलते हैं। वही भाषा, वही बैठने का तरीका, वही चाय की सुडुक सुडुक। तभी इज्जत भी पक्की होती है।
मेरे एक बुजुर्ग मित्र जो एक सेवानिवृत्त बड़े अधिकारी हैं वह बताते हैं, “मैं जब भी लोहाघाट अपने गांव जाता हूं, तो कुर्ता-पायजामा या फिर साधारण सा कमीज पेंट पहन चलता हूं। ग्रामीणों के साथ वहीं जमीन और चबूतरे पर बैठता हूं। तब लोगों को अपनापन सा लगता है।” यही पहाड़ की संस्कृति है। ओहदा आपका पेशा है, व्यवहार आपकी पहचान है।
वह कहते हैं गांव बिरादरी से दूर अपना ओहदा त्याग कर ही गांव वालों के बीच पहुंचो, इज्जत खुद-ब-खुद मिलेगी। वरना ऐसे तो कितने आए और चले गए हो गए रहते हैं।
इसलिए गांव का जीवन जैसा चल रहा है उसे चलने देना चाहिए। किसी भी गांव को चलाने में उसके उन ग्रामीणों का एक सामुहिक निर्णय होता है जो वर्तमान में उस गांव में रह रहे होते हैं। यहां से प्रवास कर गये लोगों की गांव में दखलंदाजी करना ठीक नहीं है। ज्यादा दखलंदाजी और अनावश्यक ज्ञान देने में यहां लाट साहब कहलाते देर नही लगती।



