बड़ा ही चमत्कारी शब्द है “मेशा” ।
आमतौर पर यह चम्पावत जिले और आसपास में बोला जाता है।
किसी से पूछो कि तुझे दिन में आना था और तू रात में क्यों आया ?
उसका उत्तर होगा,” दिन में मेशा नहीं बन रहा था”,
बात यहीं खत्म हो जाती है ।कोई नाराजगी नहीं रहती है।
जब दो परिवारों की आपस में बोलचाल बंद हो तब वहां भी मेशा कराने वाला चाहिए।
आपको किसी कार्यक्रम में जाना हो, वहीं आपके एक और चिर परिचित को जाना हो और वह आपसे चलने का आग्रह करें , परन्तु आप उनके साथ नहीं जाना चाहते हैं ,😌
तो बस एक ही वाक्य बोलना होता है “आपके साथ मेरा मेशा नहीं हो पा रहा है”, तब वह व्यक्ति बुरा नहीं मानता।
दो व्यक्तियों को कहीं खाने पीने वाली पार्टी करनी हो और तीसरा अचानक आ जाए, किन्तु वह इस प्रकार की पार्टी से दूर रहता हो और ऐसी स्तिथि में आपकी बात का वह बुरा भी न माने, तो आपको सिर्फ इतना कहना होता है कि “भाई साहब आप जाओ, आज आपके साथ मेशा नहीं बन पा रहा है”। ऐसा बोलते ही वह खुशी खुशी उठकर चला जाता है।
गांव में एक अंकल जी हैं कभी उनका मेशा हमारे साथ बैठने का होता है, कभी हमारे आग्रह करने पर भी नहीं बैठते हैं यदि उनसे भी पूछा जाए आज क्यों नहीं बैठ रहे हो तो उनका भी जवाब होता है “आज मेरा मेशा नहीं है “।हम समझ जाते हैं आज उनका मेशा नमकीन और दिव्य पेय वाले साथी के साथ है। यदि हमारे पारिवारिक दैवीय समस्याएं होती हैं, तो उनका भी निपटान डंगरिया देवता भी इसी मेशे से करते हैं । बचपन में हमारे चाचा के पास एक बैल था खेत जुताई के लिए एक बैल की आवश्यकता और होती थी। चाचा वहां से तीन किलोमीटर दूर, दूसरे गांव किसी दूसरे से बैल लाए, खेत जोतने के बाद तीन किलोमीटर दूर उसे पहुंचाने के लिए गए।
मैंने पूछा गांव में तो दूसरे के पास भी एक बैल था, चाचा ने बताया उसके साथ मेरा मेशा नहीं बनता है।🤗
किसी की लुगाई तीन दिन के लिए मायके जाए और हफ्ते तक नहीं आए, घरवाला आकर पूछे, तो ससुराल वाले कहते हैं यहां से पहुंचाने का किसी का मेशा नहीं हो रहा था, ये बढ़िया हुआ,कि आप आ गए😜।
परसों ताऊजी अपने यहां यजमान से कह रहे थे, “तेरे यहां मैं अपना मेशा बनाकर आऊंगा और तेरे पिता का श्राद्ध कर जाऊंगा “😛
कई लोगों को मेशा कराने में विशेषज्ञता होती है, ये आम तौर पर गांव में प्रभावशाली होते हैं।😀
कई लोगों को कहा जाता है कि वह दुष्ट प्रवृत्ति का है, “किसी का मेशा नहीं होने देता”😡
सावधान! मैंने कई लोगों से सुना है “थोड़ी सी असावधानी से, बना हुआ मेशा भी बिगड़ जाता है ” इस चक्कर में काम अटक जाते हैं।
मेरी परेशानी इस मेशे से बहुत ज्यादा है, लोग मुझे काम बताते हैं कर दिया, तो कोई धन्यवाद नहीं देता है, परन्तु उनका कार्य नहीं हो पाया तो कहते हैं, “तूझे ये काम दिया था, परिवार मैं भी तेरा मेशा है, नौकरी भी पास की है, थोड़ा सा मेशा करने की जरूरत थी, और हमारा काम हो जाता”।
एक दिन तो मेरा सर चकरा गया,
जब चार पांच महिलाएं खेत के एक किनारे पर हाथ में मिदरा( छोटी कुदाल) लेकर खड़ी थी,
मैंने पूछा क्या निरीक्षण कर रही हो? उत्तर में सब एक साथ बोली, “गोड़़ने(निराई गुड़ाई) का मेशा इधर से ही लगाएंगे”।
दुख की बात मेरे लिए यह है कि मैं इस मेशे का लाभ लेने से वंचित रह जाता हूं😓
- रमेश चंद्र ‘चम्पत’



