सखी गाँव चलें, खेलें होली
हे री, गाँव चलें, खेलें होली
सज के सँवर के मंदिर पहुँची
माँ नंदा सुनंदा की डोली
बालक बालक गिरधर मोहन
हर एक माता है भोली
बंसी धुन पर नाच रही है
ग्वालन बालन की टोली
सीधे साधे लोग यहाँ के
मिसरी सी मीठी बोली
अबीर गुलाल का रंग बरसता
हाँ गोरी की भीग रही चोली
चैत बैशाख में काफल पाके
फागुन में गुड़ की भेली
किसके आँगन ढ़ोल बजे है
किसके आँगन है होली
बूबू के आँगन ढ़ोल बजे है
आमा के आँगन है होली
सखी गाँव चलें, खेलें होली……….
- दिनेश जोशी 'नीरव'
