पहाड़ों से गायब होती ‘पाली-पल्ट’ परंपरा और बंजर होते खेत-खलिहान

लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

पाली और पल्ट जैसी सामूहिक परंपराओं के संरक्षण की है समाज को दरकार,
जंगली जानवरों के आतंक और पलायन से हो रहे खेत-खलिहान बंजर बेकार !

बुजुर्गों से चली आ रही पाली और पल्ट जैसी सामूहिक परंपराएं पहाड़ की असली विरासत रही हैं। इन परंपराओं से गांव के सभी काम चुटकियों में निपट जाते थे, लेकिन पलायन के चलते अब ये परंपराएं दम तोड़ रही हैं और खेत-खलिहान बंजर नजर आने लगे हैं। पहाड़ में खेती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है। सूअर, बंदर, भालू और हिरण का खतरा पहले भी था, लेकिन तब गांवों में एकजुटता रहती थी।

पशुओं को जंगल में चराने के लिए पाली और खेती-बाड़ी, गोबर ढुलाई, लकड़ी-घास कटाई में एक-दूसरे की मदद के लिए पल्ट की परंपरा थी। पूरा गांव एक परिवार की तरह काम करता था। सामाजिक चिंतक प्रकाश चंद्र जोशी शूल कहते हैं वह भी बचपन में पाली-पल्ट का हिस्सा रहे हैं। उनका गांव तब 30-35 परिवारों की एक बाखली था, जिसे काली कुमाऊं में पट्टी भी कहते हैं। गाय-भैंस, बैल-बकरी चराने के लिए बारी-बारी पाली लगती थी। माताएं-बहनें परसो (गोबर) ढुलाई और झाड़ (घास-लकड़ी) कटाई में पल्ट लगाती थीं। यह सहयोग और सहकारिता का प्रतीक था जो अब लगभग खत्म हो गया है। वे कहते हैं कि आज गांव में 20 से 35 साल के जो युवा बचे हैं उनके घरों के आसपास के खेत भी बंजर पड़े हैं। पूछने पर युवा जंगली जानवरों से फसल बर्बाद होने की बात कहते हैं। जबकि बुजुर्गों का कहना है कि पहले लोग रात-रात भर लाठी और कनस्तर बजाकर खेतों की रखवाली करते थे।

आज लोहाघाट, बाराकोट, पाटी और चंपावत विकासखंड के दर्जनों गांवों में यही स्थिति है। कभी मंडुवा, झंगोरा, गहत, गेहूं और धान से लहलहाने वाले खेतों में अब बिच्छू घास और कुरी उग आई है। कभी आत्मनिर्भर रहा किसान अब बाजार पर निर्भर होता जा रहा है। सामाजिक चिंतकों का मानना है कि बदलती जीवनशैली और रोजगार की तलाश में हो रहे पलायन ने इन परंपराओं को कमजोर किया है। जरूरत है कि पाली-पल्ट जैसी सामूहिक परंपराओं को फिर से जीवित कर खेती और गांव दोनों को बचाया जाए।

– ललित मोहन गहतोड़ी

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