पलायन और उदासीनता ने छीनी पहाड़ की बैठकी सांस्कृतिक पहचान,
गांव-गांव गूंजने वाले भजनों की थाप और बैठक की महफिलें हो रही सुनसान !
कभी काली कुमाऊं के हर गांव में शाम ढलते ही बैठक मंडली भजन और राग छेड़ने बैठ जाती थी। ढोलक की थाप, हारमोनियम की धुन और मंजीरे की खनक पर जब बुजुर्ग भजन छेड़ते तो आसपास बच्चे और महिलाएं मिलकर उस महफिल को घेर लेतीं। वह सिर्फ भजन का आयोजन नहीं वरन गांव के सुख-दुख बांटने का एक सुलभ रास्ता माना जाता था। आज आलम यह है कि भजन मंडली तो दूर कहीं बैठक मंडली तक नहीं हो रही है। पलायन और ग्रामीणों की उदासीनता के चलते भजन गायन की सदियों पुरानी परंपरा धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही है।
इस परंपरा के टूटने की सबसे बड़ी वजह पलायन को माना जा रहा है। गांव के युवा रोजगार के लिए शहरों का रुख कर चुके हैं। जो गांव में हैं उन्होंने भी खेती से दूरी बनानी शुरू कर दी है। जब खेती नहीं हो रही तो पूस में खाली बैठने का सवाल ही नहीं रहता। दूसरा कारण इसे ग्रामीणों की उदासीनता माना जा रहा है। नई पीढ़ी को भजन में रुचि नहीं रही। आज बुजुर्गों के पास वर्षों का सीखा हुनर है पर इसे सुनने वाले कद्रदान अब यहां मौजूद नहीं हैं।
पाटी के बुजुर्ग केशव दत्त बताते हैं कि पहले हर गांव में लगभग रोज भजन मंडलियां आयोजित होतीं थीं। हर मंडली में ढोलकिया, अपना हारमोनियम वादक और विभिन्न रागों के जानकर शामिल होते थे। शाम को घर के काम निपटाकर सभी एक जगह जुट जाते और खूब मनोरंजन करते थे। इस दौरान बीच-बीच में भजन के बहाने गांव की समस्याओं पर भी चर्चा और समाधान निकाले जाते थे। गांव के छोटे बच्चों और युवाओं को वहीं से आदर्श जीवन जीने के संस्कार मिलते थे। आज गांव में संस्कृति के कद्रदान लोग इक्का-दुक्का ही बचे हैं। सामाजिक चिंतकों की मानें तो समय रहते विलुप्त हो रही इस संस्कृति पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब भजन मंडली की यह थाप सिर्फ किस्से-कहानियों में ही सुनाई देगी।
पूस के पहले रविवार से खड़ी होली तक चलता है काली कुमाऊं में बैठकी होली का दौर । हालांकि कुछ खास जगहों पर बैठक के आयोजन की परंपरा अभी भी सांस ले रही है। जिले के पाटी, चंपावत, लोहाघाट के मंदिरों और कुछ पुश्तैनी घरों में अभी भी बुजुर्ग इस लौ को जलाए हुए हैं। वे पूस के रविवार को बैठकी होली की महफिल सजाते हैं। पर दर्शकों की संख्या परिवार के लोगों के अलावा उंगलियों पर गिनी जा सकती है। इस दौरान समूचे कुमाऊं में पूस माह के पहले रविवार से बैठकी होली की शुरुआत कर दी जाती है।
शुरुआती पूस की ठिठुरन में जब खेतों का काम थम जाता तब गांव के चौपाल, मंदिर या किसी बुजुर्ग के आंगन में बैठकी होली की महफिल जमती है। इस आयोजन में होली के साथ-साथ भजन गायन की परंपरा चलती रहती है। होली के राग के साथ रात भर शिव, कृष्ण और राम के भजन गाए जाते रहे हैं। यह सिलसिला खड़ी होली तक अनवरत चलता रहता है, जो पहाड़ की असली सांस्कृतिक पहचान रही है।



