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काली कुमाऊं • पोस्ट

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पहाड़ और जीवन से जुड़े विचारों, अनुभवों और लेखों का संग्रह।

  • पौत

    लेखक: रमेश चम्पत

    पौत

    जिसकी पौत नहीं होती, उसी का मान सम्मान होता है।हमारे गांव में जिसके पास पौत नहीं होती है,उसको अच्छा भाव मिलता है। कोई आपको अपने घर आने का निमंत्रण दे और आप चले गए और घर जाकर बोला “मेरी तो पौत नहीं हो रही थी,बड़ी मुश्किल से समय निकाला “तो इज्जत बढ़ जाती है भले…

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  • बंजर खेत और गांवों का सूनापन दे रहा पहाड़ के बढ़ते पलायन की गवाही

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    बंजर खेत और गांवों का सूनापन दे रहा पहाड़ के बढ़ते पलायन की गवाही

    बंद और पुराने घरों के बीच रह रहे बुजुर्ग और बच्चे, आसपास खेतों में उग रही कंटीली झाड़ियां , चंपावत जिले के सीमांत गांवों में बीते दो दशकों से बढ़ रहा पलायन अब केवल विभागीय आंकड़ों में नहीं, बल्कि गांवों के सूनेपन में साफ झलक रहा है। कभी हरी-भरी फसलों से लहलहाते खेत आज बंजर…

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  • बंद कमरों का सन्नाटा और भीतर की उलझन

    लेखक: डॉ. देवकी नन्दन गहतोड़ी

    बंद कमरों का सन्नाटा और भीतर की उलझन

    कभी आपने पहाड़ के किसी पुराने, बंद पड़े घर की चौखट को देखा है? जब कोई परिवार रोजगार या किसी और मजबूरी में अपने पुस्तैनी गोठ (आँगन) को छोड़कर शहर चला जाता है, तो उस बंद घर में क्या होता है? कोई बाहर से कूड़ा फेंकने नहीं आता, कोई जान-बूझकर उसे गंदा नहीं करता। लेकिन…

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  • गजबज

    लेखक: रमेश चम्पत

    गजबज

    हमारे यहां गज़बज खूब बोला जाता है। आज मेरी पौत हो रखी है…..

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  • मेसा/मेशा

    लेखक: रमेश चम्पत

    मेसा/मेशा

    बड़ा ही चमत्कारी शब्द है “मेशा” ।आमतौर पर यह चम्पावत जिले और आसपास में बोला जाता है।किसी से पूछो कि तुझे दिन में आना था और तू रात में क्यों आया ?उसका उत्तर होगा,” दिन में मेशा नहीं बन रहा था”,बात यहीं खत्म हो जाती है ।कोई नाराजगी नहीं रहती है।जब दो परिवारों की आपस…

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