ठंडी ठंडी हवा ये, ये खुला साफ़ आसमान है
इन वादियों में, वक्त भी ठहरा हुआ मेहमान है
जाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से है
कुछ तो है कहीं जो, दिल का रिश्ता पहाड़ों से है
टेढ़े मेढे रस्ते मगर, साफ़ दिलों का ठिकाना है
रहता हूं कहीं भी मगर, तेरे पास लौट आना है
पंचाचूली की चोटियों को बादलों ने जब भी घेरा है
मन के आंगन में कहीं अनगिनत यादों का डेरा है
उजली धूप से, हरी दूब से, ये गुज़ारिश जाड़ों से है
जाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से है
कुछ तो है कहीं जो, दिल का रिश्ता पहाड़ों से है
फुर्सत से बैठें ज़रा तुमसे कई मुलाकातें करनी हैं
अंगीठी की आँच सेकें, ढेरों लंबी बातें करनी हैं
जैसे बात हो कल की, साथ मेरे अब भी यहीं हो
इतना है मुझे भी यकीं भूले मुझको तुम भी नहीं हो
नई हो पुरानी बचपन या जवानी हर कहानी बहारों से है
जाने क्यों है मगर, राब्ता कोई उजले नजारों से है
हर बात ऐसी है तेरी, दिल का रिश्ता पहाड़ो से है
– दिनेश जोशी ‘नीरव’



