हमारे यहां गज़बज खूब बोला जाता है। आज मेरी पौत हो रखी है,
लगे हाथ गज़बज पर चर्चा कर लेते हैं। साहब, यह जो शब्द गजबज है ना इसमें अपने आप में बड़ी गजबज है । इस गज़बज ने बड़ा दुखी कर रखा है मुझे।
मैं अपने दोस्त के साथ कहीं गया हुआ था अपने परिचित के यहां। इतने में ही चाय आ गई, जैसे ही परिचित अंदर गए दुबारा कुछ लाने, मित्र मेरे कान में बोला , ददा , आप चाय पी लो, मैं तो नहीं पीऊंगा, अगर दोनों नहीं पिएंगे,तो ये नाराज हो जाएंगे। तुम तो , एकदम भ्यास हुए
।तुम लोगों को कुछ नही होता है बल, तुम्हारा तो आंग भी नहीं झीसाता है बल
। लेकिन मुझे गज़बज नहीं पचती।
अब भ्यास का अर्थ मुझे पता था मैं हत्थे से उखड़ गया। उससे थोड़ा नाराज़गी रही मेरे मन में, लेकिन मुझे पता चल चुका था कि खाने पीने वाली चीजों में अगर गज़बज हो गई तो फिर आंग झीसा जाता है
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अब भाई साहब मैं अपने दूसरे मित्र के पास गया, क्योंकि इन महाशय से तो मेरी अनबन हो चुकी थी। मैंने उसको पूछा जब गज़बज से आंग झीसा जाता है तो क्या होता है ?![]()
। उसने बताया, ददा कम ग़ज़बज हुई , या अनजाने में हुई तो, आंग में पित्त हो जाते हैं, बड़ी गज़बज हुई, या आपने जानबूझकर की हो तो खून की उल्टी भी आ जाने वाली ठैरी । भाई साहब उसने जो बताया तो फिर मेरे रोंगटों के भी रोंगटे खड़े हो गए
। मैं सोच रहा था कि गज़बज अब पूरे तरीके से मेरी समझ में आ चूकी है, हाए विधि का विधान, ओहो रे, परमात्मा की माया![]()
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एक दिन नीचे सड़क में एक ताऊजी खड़े थे, मैंने पूछा, यहां क्या कर रहे हैं ? बोले, “बस का इंतजार कर रहा हूं, लेकिन आज बस की गज़बज लग रही है। अब सोच रहा हूं टैक्सी में चला जाऊं’। मैं तुरंत बोल उठा,( क्योंकि ज्ञानी तो मैं अनिल गुरू और शिब्बूका की संगति में बैठकर हो चूका था।) हां, ताऊजी बस में गज़बज है तो आप टैक्सी में चले जाओ, चूंकि आप जानबूझकर गज़बज नहीं कर रहे हैं गज़बज केवल बस कर रही है। इसलिए आपको खून की उल्टी तो नहीं होंगी, लेकिन आपके आंग में पित्त हो जाएंगे।![]()
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। ताऊजी हंसते हुए बोले ये वैसी गज़बज नहीं है,
कुछ नहीं होगा थोड़ा किराया अधिक लगेगा।
भाईसाहब अपन तो कन्फ्यूजियाने लग गए थे हल्का हल्का।![]()
पिछले महीने गांव के दो घनिष्ठ मित्रों की बातचीत बंद हो गई है,यह पूरे गांव में चर्चा का विषय थी। उनकी दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। लेकिन अब एक दूसरे की शक्ल देखना पसंद नहीं करते हैं। उन दोनों के घरवालों से लोगों ने जानकारी ली, तो पता लगा दोनों गांव की सारी नाशपाती खरीद कर हल्द्वानी मंडी में बेचने गए थे, ![]()
वहां पता नहीं क्या गज़बज हुई , उस दिन से दोनों बोल नहीं रहे हैं।![]()
सब लोग समझ गए क्या गज़बज हुई होगी,
मेरी समझ में अभी तक नहीं आया अब ये कौन सी गज़बज है भाई, जिससे लोगों का बोलना छूट जाता है ?![]()
कैलाश दाज्यू और जगदीश की हरकतें तो आप जानते ही हैं,
कैलाश दा ने किसी को पैसे भेजने थे, जिसके में नेट बैंकिंग नहीं थी । परिणामस्वरूप जगदीश के खाते में डाल दिए। ![]()
एक दो लोगों ने मेरा नाम लेकर कहा दाज्यू के खाते में क्यों नहीं डाल रहे हो, ये तो पड़ोस में ही रहते हैं।
कैलाश दा ने तो मेरे समूचे बदन में आग ही लगा दी, जब उन्होंने कहा, बात तो आपकी ठीक है, लेकिन धनराशि ज्यादा है, और रमेश भैय्या की सैलरी कम है।![]()
अगर इन्होंने कोई गज़बज कर दी तो, फिर पैसे फंस जाएंगे।
जगदीश जी ने कुछ गज़बज कर दी तो कम से कम पैसे तो वापस आ जाएंगे।![]()
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अब मेरी समझ में ये नहीं आ रहा था कि ये दो अलग-अलग टाइप की कैसी गज़बज हैं, जिसमें एक में पैसे वापस आते हैं ? दूसरे में नहीं आते?
अगर विजय माल्या और नीरव मोदी पहाड़ी होते तो बेचारे बैंक वाले उनसे कहते लोन के पैसों में गज़बज करो तो दूसरे टाइप की करना, जिसमें हमारे पैसे वापस आ जाएं![]()
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छोड़ो कहां लगे हो, यहां सब गज़बज है।![]()
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- रमेश चम्पत



