हरिनंदन जी घर पर गुमसुम रहते थे ,उनकी बहू का क्रोधपूर्ण व्यवहार ही उसका कारण था। आसपास के लोग भी जानते थे कि बहू का व्यवहार अपने सास ससुर के प्रति ठीक नहीं है।
बहू को गांव के लोग पीठ पीछे झगड़ालू नाम से पुकारते थे। आज तक हरिनंदन जी का समय ऑफिस जाने और अन्य कार्य को करने में बीत जाता था।
परंतु रिटायरमेंट के बाद कुछ समय खाली हो गया तो बहू से वाद-विवाद बढ़ने लग गया|अंत में थक हार कर दोनों पति-पत्नी ने मौन का रास्ता चुन लिया। बहू घर के सारे कार्य करती थी परंतु वाणी में संयम नहीं था बुजुर्ग दंपत्ति को यह बात अखरती थी। बेटे ने कुछ समय तक स्थिति को सुधारने की कोशिश की, परंतु थक हार कर बैठ गया।कुछ समय बाद बहु पूरे परिवार पर हावी हो गई।
हरिनंदन जी के दो बेटे थे, बड़ा शशिकांत और छोटा बेटा विनय। बड़े की शादी को दस साल हो गए थे। छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा था। हरिनंदन जी ने विनय को कहा वह इन सब बातों में ना पड़े, और अपना ध्यान अपने कैरियर पर लगाए, जब उसे नौकरी मिल जाएगी तो उसकी शादी करने के बाद दोनों उसके साथ ही रहेंगे। छोटे बेटे को यह सलाह बहुत पसंद आ गई और रात दिन मेहनत कर उसने प्रतियोगिता परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी हासिल कर ली थी। एक साल बाद अच्छे घर से रिश्ता आने पर उसकी शादी कर दी। लड़की और उसके मायके वाले बड़े सुशील और संभ्रांत परिवार से थे।
दोनों बुजुर्ग दंपत्ति ने जो निर्णय सोचा था उसी के अनुसार छोटे बेटे की पोस्टिंग होते ही वह भी चले गए। दोनों बड़ी बहू और उसके बच्चों को आशीर्वाद देकर छोटे बेटे और उसकी पत्नी के साथ चले आए।
गांव में सब लोगों को संतोष था कि छोटा बेटा आज्ञाकारी भी है और उसकी बहू भी सुशील है और शिष्टाचार के साथ ही सास ससुर से बात करती है। । छोटे बेटे ने पोस्टिंग वाली शहर में ही मकान खरीद लिया जो सबके रहने के लिए पर्याप्त था।विनय ने बाबूजी के कमरे में बड़ा सा टीवी भी लगवा दिया था और उसमें धार्मिक चैनलों का पैकेज भी उसने खरीद लिया था, हरिनंदन जी और उनकी पत्नी को विश्वास नहीं हो रहा था कि एकाएक इस प्रकार का सुख जीवन में मिलने जा रहा है।
विनय ने एक छोटी सी रसोई भी मां बाबूजी के कमरे से सटाकर बना दी थी ताकि रात में उन्हें यदि चाय या गर्म पानी की आवश्यकता हो तो उठ कर बड़ी रसोई में ना जाना पड़े। एक छोटा सा फ्रिज उसने बाबूजी के कमरे में भी लगा दिया था, उसकी पत्नी हमेशा ध्यान रखती थी की फल और दूध दही इसमें हमेशा उपलब्ध रहे।परंतु एक माह बीतते हरिनंदन जी और उनकी पत्नी ने घर वापस जाने का निर्णय ले लिया। विनय और उसकी पत्नी ने दोनों को बहुत प्रकार से समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अपने निर्णय पर अड़े रहे
उन्होंने अपने व्यवहार या किसी अन्य प्रकार की परेशानी के संदर्भ में भी पूछा, जिस पर दोनों का कोई भी विरोध या दुख नहीं था। इधर गांव वाले भी हैरान थे की झगड़ालू बहू के सिर से बोझ हटने के बाद भी वह इतना कमजोर क्यों हो गई है ?जबकि उसकी जिम्मेदारियां तो कम हो गई हैं।शशिकांत भी अपने बच्चों के एकदम से समझदारी वाले व्यवहार पर हैरान था, दादा दादी के जाते हैं उनकी शरारतें एकदम से कम हो गई थी। वह एकदम बड़े बच्चों की तरह व्यवहार करने लग गए थे।
इधर गांव पहुंचते ही गांव के लोगों का उनके पास आना जाना शुरू हो गया, सब लोग हैरान थे कि इतने आज्ञाकारी बहू बेटे को छोड़ने के बाद फिर क्यों यह दोनों बुड्ढे बुढ़िया इस जोरू के गुलाम बेटे के पास रहने आ गए हैं? लेकिन हरिनंदन जी और उनकी पत्नी को झगड़ालू बहू के पास रहने का कारण समझ में आ गया था,परन्तु शब्दों में बयां करने में असमर्थ थे।हरिनंदन जी और उनकी पत्नी की गांव की दिनचर्या पुनः शुरू हो चुकी थी, साथ ही घर में बच्चों का कोलाहल भी वापस आ गया। कुछ चीजें अभी छूट रही थी।
शशिकांत के बच्चों का झगड़ना, दादा दादी द्वारा इनकी पंचायत करना,मगर अब झगड़ालू बहू बीच में नहीं आ रही थी। दूर आंख की पलकों में आंसू भरे दरवाजे के कोने से से सबकुछ देखती, और अपना कार्य करती रहती।
केवल शशिकांत सम भाव था,उस पर कोई विशेष परिवर्तन नहीं था। वह बाबूजी से भी बातचीत करता और आज्ञाकारी पति की तरह पत्नी की सारी बात मानता है।
शाम को दादा नित्य अपनी सैर पर चले गए, दादी अपने सत्संग में, बच्चे दोस्तों के साथ खेलने। परन्तु वापसी पर गंदे कपड़ों पर बच्चों से कोई टोका टोकी नहीं हुई। हरिनंदन जी को मुंह हाथ धोने को बाथरूम में पानी, तौलिया रखा मिला, जूते उतार कर अपनी जगह में रख दिए गए,बाहर आते ही रोज की तरह उनकी चप्पल रखी मिली, नहीं मिला तो केवल “देर में कहां से आ रहे हो” वाला कठोर शब्द और वह बड़बड़ाना, जो झगड़ालू बहु का पांच मिनट का नित्य प्रोग्राम था।
बहू ने इस बार कपड़ों की बारीक जांच भी नहीं की, जो हरिनंदन जी ने अभी अभी बदले।
पत्नी के पास चाय और हरिनंदन जी के पास काढ़ा भी आज बिना गुस्से के पहुंच गया, ये अजीब सी सुनसानी जो हरिनंदन जी की चाह थी,अब मिलने लगी है पर न जाने क्यों कचोटने लगी थी ?
शाम का खाना बच्चों ने खा लिया, वह हमेशा की तरह अपने कमरे में सो गए। शशिकांत हमेशा की तरह चुपचाप खाकर अपने कमरे में चला गया। इस बार दोनों साथ में खा रहे थे पर झगड़ालू बहु ने टोका नहीं, और घी ,आचार, दही के बर्तन लाकर सामने रख दिए। देर रात में हमेशा की भांति बहु दूध के दो गिलास लेकर आई, परंतु इस बार बगैर कुछ बड़बड़ाते हुए, शांत चुपचाप, और आश्चर्यजनक जनक रुप से बगैर तेज कदमों पलटते हुए जाने के बजाए एक कोने में खड़ी हो गई। अब सब तरफ शांति थी। जैसे दुध के एक घुंट पीने का इंतजार कर रही हो, यही सोचकर हरिनंदन जी और उनकी पत्नी ने दूध का एक घूंट पी लिया।
अचानक रूंधे हुए गले से एक आवाज आई, जो हरिनंदन जी को संबोधित थी, ” बाबूजी दूध में मीठा कम तो नहीं है न?”
दोनों तरफ से कोई उत्तर नहीं आया, आ रही थी तीनों तरफ से फफक फफक कर सिसकियों की आवाज।
- रमेश चम्पत



