घनश्याम और भैंसी का दूध

लेखक: रमेश चम्पत

घनश्याम सरल और सीधे स्वभाव के व्यक्ति थे, चार बहनों के बाद घनश्याम पैदा हुए थे इसलिए ईजा और बाज्यू के बहुत लाडले थे। उनके होने से पहले घर में जर्सी गाय थी और सब लोग उसी का दूध पीते थे।

घनश्याम के होने के बाद माता-पिता को लगा कि इनके पालन-पोषण में कोई कमी ना रह जाए इसलिए पिताजी ने घर में भैंस बांध दी थी।

घनश्याम घर के इकलौती संतान हुए क्योंकि तत्कालीन समाज में लड़कियों की तो गिनती नहीं मानी जाती थी, अर्थात होते ही उन्हें पराया धन की संज्ञा दी जाती थी, यदि किसी ने पूछ भी लिया कि संतान कितनी हैं तो लड़कों की संख्या ही गिनी जाती थी। इसलिए घर की इकलौती संतान कहा जाता था।

बचपन में उनकी खूब टहल (सेवा) हुई थी। गांव में एक किस्सा था, कि बिना पानी का दूध नवरात्रों में देवताओं ने पिया है या साल भर घन्नू ने पिया है।

घनश्याम को लोग बचपन से ही लाड़ प्यार से घन्नू कहते थे। घन्नू बुढ़ापे की संतान थे। उनको घरवालों ने खूब उफ्ल्या (सर चढ़ा) रखा था। आस पास के बड़े बुजुर्ग भी अपने नाती पोतों को सख्त हिदायत दे देते थे कि खबरदार! घन्नूका के साथ पाज (झगड़ा) मत करना, क्योंकि घन्नू हमउम्र बच्चों का रिश्ते में चाचा लगता था।

जब घन्नू आठ वर्ष के हो गए तो उनके पिताजी ने उनका एडमिशन कक्षा एक में करवा दिया, घन्नू का मन स्कूल में कहां लगता था, बड़ी मुश्किल से हांफटाइम तक रुक पाते थे। हांफटाइम में पूजनीय माता जी का पुत्र प्रेम जागृत हो जाता था, और मास्साब के लिए कांच की बोतल में बाकड़ी भैंस (लगातार आठ महीने से दुध देने वाली) का शुद्ध दूध ले जाती थी, ठीक वैसा ही जैसा सेवन घन्नू घर में करते थे।

मास्साब शुद्ध दूध की चाय में मस्त होकर घन्नू को घर जाने की अनुमति दे देते थे। अन्य बच्चों को छुट्टी मांगने पर कूटा जाता था, जब तक वह पैजामे में हग ना दें तब तक गुरूदेव छुट्टी नहीं देते थे।

यहीं से प्रथम बार घन्नू को बाकड़ी भैंसी के दूध का प्रभाव मालूम हो गया। इस प्रकार घन्नू माटसाफ (गुरूजी) को बाकड़ी भैंसी का दूध इंटरवल में देकर लगातार कक्षा चार पास कर गए। उन दिनों कक्षा पांच में बोर्ड परीक्षा होती थी, घन्नूके पिताजी और मास्टर साहब को भली-भांति ज्ञान था कि घन्नू महाराज का कक्षा पांच की वैतरणी पार लगना कठिन है, क्योंकि एसडीआई (वर्तमान में उप शिक्षा अधिकारी) साहब भी हफ्तों से अपना झोला झंडा लेकर उसी विद्यालय में डेरा डाल देते थे जहां कक्षा पांच की सम्मिलित परीक्षाएं होती थी।

एस डी आई साहब को स्कूल में एक खाना बनाने वाला मिल जाता था। लेकिन मास्टर साहब ने अपने परम शिष्य को पास कराने के लिए नई तरकीब पर काम शुरू कर दिया था। एसडीआई साहब के विद्यालय में डेरा डालते ही मास्टर साहब ने घन्नू के पिता जी को उनकी सेवा में हाजिर कर दिया।

इस बार तो हद हो गई, घन्नूमहराज ने अपने हिस्से का दूध भी एस डी आई साहब को अर्पण कर दिया। एस डी आई साहब ने भी आज तक इतना स्वादिष्ट दूध नहीं पिया था।

अब तो दूध, छांस और घी में एसडीआई साहब लथपथ हो गए। तब गैस चूल्हे, और बर्तन धोने के साबून प्रचलन में नहीं थे। लोग कहते थे कि एसडीआई साहब की पन्यानी (बर्तन धोने हेतू कोयले रखने का स्थान) से भी घी और छांस की खूशबू आती थी। इस कारण एस डी आई साहब ने ठान लिया था चाहे जो हो जाए, घन्नू महाराज को पास कराना ही है।

बस, जब एसडीआई साहब ने ठान ली थी, तो फिर घन्नू को पांचवीं पास होने से कौन रोक सकता था। एसडीआई साहब ने परीक्षा केंद्र में सबसे होशियार बालक के पास में घन्नू को बैठा दिया। इस प्रकार गिरते पड़ते घन्नू ने पांच पास कर लिया।

अब घन्नू कक्षा छह के विद्यार्थी हो गए। अब तक थोड़े दांवपेच घन्नू के पिताजी भी सीख चुके थे। एक किलो दूध उन्होंने इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य जी के यहां लगा दिया, एक किलो कक्षा अध्यापक के यहां। उन दिनों यह प्रथा प्रचलन में थी कि कठिन विषय जैसे की गणित विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक ही क्लास टीचर बनाए जाते थे।

क्लास टीचर और प्रधानाचार्य जी ने जब गटपट दूध पीना प्रारंभ किया, वह दोनों तो सीधे परलोक पहुंच गए। अब घन्नू के पिताजी कक्षा अध्यापक बदलते ही दूध भी बदल देते थे। यह सब उसी बाकड़ी भैंसी का कमाल था। गुरुजनों में घन्नू के कक्षा के क्लास टीचर बनने की होड़ मची रहती थी। क्योंकि दूध के साथ साथ हर दूसरे तीसरे दिन प्रधानाचार्य जी एवं क्लास टीचर महोदय के यहां ताजी सब्जियां पहुंच जाया करती थी। इस प्रकार कक्षा नौ तक घन्नू को पास होने से कोई ताकत नहीं रोक सकी थी। घन्नू को भैंस के दूध का महत्व अब भलीभांति पता लग चुका था।

अब बारी दसवीं बोर्ड परीक्षा की थी। यहां पर भैंस भी पानी में चली गई। क्योंकि उधर अथाह शिक्षकों का जमावड़ा होता था। और घन्नू के पिताजी की तरह दूध बांटने वालों की संख्या में भी कोई कमी नहीं थी। बाहर से फ्लाइंग की टीमें (उड़न दस्ते) अलग से आती रहती थी। सभी के आशाओं के अनुरूप घन्नू सारे विषयों में फेल हो गए थे।

सारी बहनों की शादी हो चुकी थी, दो चार साल घन्नू दायें बाएं रिश्तेदारी में घूमते रहे, उसके बाद उनके पिताजी ने उनकी शादी कर दी।

प्रधानाचार्य जी ने घन्नू का दूध एवं छांस खाई थी, इस कारण उनके दिलो-दिमाग से घन्नू कभी निकले नहीं थे, क्योंकि वास्तव में घन्नू के अंदर छल कपट नहीं था। प्रधानाचार्य जी प्रमोशन पाकर जिला विद्यालय निरीक्षक बन गए थे। चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए तब बहुत ज्यादा मारामारी नहीं होती थी, उन्होंने घन्नू के पिताजी को बोलकर दो चार जगह आंफिस में मिठाई पानी भिजवा कर एक विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी में घन्नू को नौकरी लगवा दिया था।

घन्नू हमेशा एहसान मानने वाले लोगों में रहे थे, उन्होंने प्रण कर लिया था कि जब तक प्रधानाचार्य साहब (जिला विद्यालय निरीक्षक) रहेंगे उनको बाकड़ी भैंसी का दूध, छांस (मठ्ठा) और घी वह निशुल्क खिलाते पिलाते रहेंगे, और कैसा भी समय रहा हो घन्नूका अपना प्रण निभाते रहे। समय चलता रहा कुछ साल बाद घन्नूका के ईजा बाज्यू भी स्वर्ग सिधार गए थे। लेकिन घन्नूका ने भैंस पालना नहीं छोड़ा। लेकिन अब घन्नूका जो भी भैंसी लाते तीन चार महीने दूध देने के बाद वह बिगड़ जाती थी। थक हार कर एक दिन उन्होंने सुखदेव बामन को अपना पातड़ा (जन्मकुंडली) दिखाया।

सुखदेव बामन ने कहा “जजमान तेरे भाग में दून तो है, लेकिन जतन खूब करने हैं” ये ऐसी बात बामन देवता बता गए थे, जो ना इधर की थी, ना उधर की थी, किन्तु सत्य थी, जिसमें घन्नूका आजीवन पिसने वाले थे।

घन्नूका ट्रांसफर करवा कर गांव के नजदीक के स्कूल में ही आ गए थे। बस भैंस पालने की उनकी धुन नहीं जा रही थी, क्योंकि वह भैंस के दूध के चमत्कार बचपन से देख चुके थे।

इसके बाद घन्नूका भैंस लाते, तीन महीने ठीक-ठाक दूध देती थी, उसके बाद में भैंसी बिगड़ जाती, घन्नूका चाख मंतराने गांव में प्रेम सिंह दादा जी (पीरबू) नाम के सहायता करने वाले बुजुर्ग के पास पहुंच जाते। अब घन्नूका ने परमानेंट चार पांच कट्टे डैढ़े वाले नून (नमक) के हमेशा घर में रखने शुरू कर दिए थे। क्योंकि हर तीसरे दिन उनको चांख मंतराने जाना होता था, हरी मिर्च सुखा करके घर पर ही रखनी शुरू कर दी थी। खेत की हरी मिर्च बेचना उन्होंने बंद कर दिया था। क्योंकि हर दूसरे दिन मिर्च पो (आग में सुलगा) करके चौराहे में रखनी होती थी।

तीन महीने दूध देने के बाद तीन महीने वह चांख मंतरा कर दूध निकाला करते थे। उसके बाद घर के सदस्य भी हाथ खड़े कर देते थे। मजबूरन घन्नूका को चालीस हजार की भैंस दस हजार में बेचनी पड़ती थी। अब समस्या वास्तव में गहराने लगी थी। घन्नूका गाय पालना नहीं चाहते थे, क्योंकि स्वयं बचपन से भैंस का दूध पिया था। परिवार भैंस पाल कर परेशान हो गया था, काकी के कुछ विरोध करने पर घन्नू का रिसा जाते (नाराज होना) और स्कूल से घर आने के बजाए जंगलों में रहने चले जाते, अब काकी ने भी हथियार डाल दिए थे। छह महीने में नई भैंस लाना और उसको फिर छह महीने बाद चौथाई कीमत में बेच देने से सरकारी नौकरी में रहते हुए भी घन्नूका की आर्थिक स्थिति खराब होने लगी थी। घन्नूका का ध्यान अपने बच्चों से भी ज्यादा भैंस पालने पर केंद्रित होता जा रहा था।

घन्नूका के दो बच्चे थे बड़ा तो किसी तरह ग्रेजुएशन कर भी गया, मगर छोटा बेटा भैंस के चक्कर में हाई स्कूल भी नहीं कर पाया। घन्नूका को बच्चे की चिंता नहीं थी, उनको भैस के कामयाब न होने का रंज अवश्य था।, पीरबू ने घन्नूका के दिमाग में भ्रम डाल दिया कि यह तेरे पूर्वजों का चक्कर है घर में गद्दी लगा तो तेरे यहां भैंस टिकेगी भी दूध की भी छलबल कर देगी। पीरबू की यह बात घन्नूका को जंच गई। पीरबू की तो मन की मुराद पूरी हो गई थी, उनके तो खाने और रात काटने का इंतजाम हो चुका था। क्योंकि अपने घर में तो उन्हें कोई पूछता नहीं था। पीरबू जबरदस्त किस्म के चार औतरने वाले डंगरिये ढूंढ लाए। चारों के चारों एकदम जवान डंगरिये प्रत्येक चौबीस पू (पूरी) और तीन प्रकार का साग और एक एक बेली (बड़ा कटोरा) खीर की खाकर नियत स्थान में बैठ गए। अब खाने का नंबर पीरबू और अन्य लोगों का था। सबका खाना पीना निपटाने के बाद, आदेश मिलते ही डंगरियों का औतरना शुरू हुआ।

हाए रे तकदीर! घन्नूका का भला तो बाद में होता, घन्नूका के चाक की पाल के चार तख्ते धड़ाम से टूट गए, टूटे हुए तख्तों के लपेट में घन्नूका की घरवाली आ गई। वह बेचारी पहले तख्ते के टूटते ही गोठ में अपनी प्यारी बाकरी के मांथी में पड़ गई। बस देबता थमी गया, चीख पुकार मच गई। बाकरी तो ठौर में ही ठंड हो गई। घन्नूका का परिवार तो काकी के पैर में प्लास्टर चढ़ाने जिला अस्पताल को बुलैरो लेकर सुबह चार बजे ही निकल पड़ा। दुर्घटना में जो बकरी मर गई उसे डंगरिये अपने साथ ही ले गए। पीरबू का क्या? चार डंगरियों के साथ पलतरफै धार (पहाड़ी की दूसरी तरफ) को वो भी चल दिए। वैसे यह सुझाव भी पीरबू ने ही दिया था कि बकरी को अब डंगरियों के हवाले कर दिया जाए, क्योंकि तुम्हारे तो किसी काम की रही नहीं और आप लोगों को अस्पताल भी जाना है। घन्नूका को यह सलाह पसंद आई और उन्होंने भविष्य के लिए डंगरिए अनुबंधित हो जाएं, यह सोच कर मरी हुई बकरी दान कर दी।

घन्नूका की आर्थिक स्थिति और धरातल में चली गई, चाची का प्लास्टर और बोलेरो का किराया तीन चार बार आना जाना लगभग एक लाख में पड़ गया।

अब तो घन्नूका को यकीन हो गया वास्तव में पूरखों का किया हुआ पीड़ा रहा है। पीरबू की सलाह पूरे जोर-शोर से उनके मन मस्तक में नाच रही थी।

खैर घन्नूका को अब पाल ठीक करने के लिए धरमू मिस्त्री की आवश्यकता थी, यह विशेषज्ञ मिस्त्री पीरबू ने ही बताया था। अब धरमू को ताजमहल की जैसी फिटिंग करनी थी, घन्नू का के चाक के पाल की। तख्तों की व्यवस्था भी धरमू ने स्वयं करने का जिम्मा उठा लिया। घन्नूका के लिए पीरबू पूरे देवता बने थे। चार तख्तों को ढूंढने के दो दिन की ध्याड़ी भी धरमू को देना घन्नू का ने डन (स्वीकार) कर दिया।

दो दिन में चार तख्ते आ गए तो लाजिमी तौर पर फिटिंग करने के लिए चार चार ठीक-ठाक तख्ते दोनों साइड के भी निकाल दिए, पीरबू ने धरमू को ठोस निर्देश दे दिया था कि सूतभर भी फिटिंग उपर नीचे ना हो, नहीं तो दरी बिछाने के बाद भी पिड़ान (चूभना) लगता है। इस प्रकार घन्नू का के चाक की एक साइड की पाल पूरी उखाड़ दी गई। घर में सब कुछ घन्नूका के कहे अनुसार चल रहा था लेकिन घन्नूका का बड़ा बेटा संजय अब कुछ कुछ उकताने लग गया था। वह सोचता था कि पिताजी की नौकरी से कुछ पैसा बच जाए तो अपना कोई छोटा सा व्यवसाय करे, लेकिन घर परिवार की परिस्थिति के कारण वह कुछ कह नहीं पाता था। क्योंकि घन्नूका बार-बार कहते थे मेरी नौकरी लगने में बाकड़ी भैंस का बड़ा योगदान है।

इस प्रकार सात दिन, घन्नूका के चाक की पाल दुरूस्त होने में लग गए। सात दिनों तक धरमू और पीरबू का डेरा डफेरा वहीं रहा। कुल मिलाकर मात्र एक माह की सरकारी तनख्वाह में पीरबू ने घन्नूका की पाल ठीक करवा दी। उधर घन्नूका के परिवार में किसी को हल्का बुखार आ जाए या मुड़ा (सिरदर्द) भी लग जाए तो, चारों डंगरियों में देवता अपने आप ही आ जाता था, बिना किसी बुलावे के औतरते हुए आंगन तक पहुंच जाते थे। क्योंकि चारों स्थानीय थे, रात्रि घन्नूका के यहां प्रवास में आकर सुबह अपना काम करने निकल जाते थे। घन्नूका को बड़ा आराम हो गया था। और लोगों की तरह उन्हें देवता के लिए भटकना नहीं पड़ता था। छोटा बेटा बिज्जू (विजय) पिताश्री का फुल सपोर्टर था। भैंसी लानी हो, या भैंसी बेचनी हो, चांख मंतरानी हो, या खुर्शानी पो करके चौराहे में रखनी हो सारे काम उत्साह से करता था। घन्नूका को एक ही समस्या लगती थी, कि गद्दी लगने पर पीरबू और कंपनी के लिए तीन प्रकार का साग और खीर की व्यवस्था करनी पड़ती थी। कारण के उपर एक और कारण हो गया कि घन्नूका को हर छह महीने में नई भैंस खरीदनी और पुरानी चौथाई दाम में बेचनी पड़ती थी। दरअसल, एक सूखा साग, और उसमें से आधा निकाल कर और बचे साग में छांस (मठ्ठा) डालकर सब्जी की दो वैराइटीज बन जाती थी। तीसरी कोई नई सब्जी घन्नूका बिज्जू को अल्टो बुक कर बड़े कस्बे में भेजकर मंगा लेते थे।

घन्नूका हमेशा इस बात से परेशान रहते थे कि उनका बड़ा लड़का संजय भैंस का महत्व नहीं समझ पा रहा था, और घर पर ऐसी भीड़भाड़ होने पर सहयोग करने के बजाए अपने कमरे में जाकर बैठ जाता था। संजय में दिनों दिन भैंस और पीरबू के लिए कुढ़न बढ़ती जा रही थी।

हर हफ्ते की देबतारी होती जा रही थी, अब डंगरियों ने जहां जहां घन्नूका के पूर्वूजों के दोष साबित कर दिए थे, उन थानों में, बकरे और मुर्गे चढ़ाने शुरू कर दिए। और घन्नूका उधार पर उधार लेते गए। नौकरी लगवाने वाले साहब भी अब स्वर्ग सिधार गए थे, मगर घन्नू का भैंस पालने का फितूर बढ़ता जा रहा था। बस वह निश्चित हो गए थे कि पूर्वजों के श्राप के कारण ही उनके यहां भैंस नहीं टिक पा रही है।

हर महीने लगभग एक बकरा और पूरे गांव का भोजन घन्नूका को देना पड़ता था, दिन के कार्यक्रम के बाद रात लगभग एक पेटी आबकारी का माल कारबारियों (भोजन बनाने व अन्य काम करने वाले अपने ईष्ट मित्र) के लिए अनिवार्य था। पचास हजार पार की सरकारी नौकरी वाले घन्नूका पंद्रह लाख के लोन तले बिना कुछ किए भैंसी प्रेम में दब गए। उधर संजय का धैर्य भी जवाब देने लगा था। इधर संजय का धैर्य भी जवाब दे रहा था। इसी बीच पीरबू ने घन्नू को एक नई सलाह दे दी कि एक डांगर संजय के ननिहाल क्षेत्र का भी बुलाया जाए। क्योंकि थोड़ा पकड़ तेरे परिवार में संजय के ननिहाल से भी है। घन्नूका फटाफट इस बात के लिए भी तैयार हो गए।

घन्नूका तो घन्नू का ठहरे उन्होंने आठ हजार अल्टो की बुकिंग देकर पीरबू के रास्ते के चाय-पानी का खर्चा देकर रवाना कर दिया।

सुबह के चार बजे गए पीरबू शाम तक डंगरिया को लेकर घन्नू के घर पर पहुंच चुके थे। अब तो इलाके में ही हलचल थी। आस पड़ोस के गांव के लोग भी आ चुके थे। इतनों के लिए चाक में जगह होना संभव नहीं था।

लिहाजा बाहर आंगन में ही तिरपाल लगाकर सबके बैठने की व्यवस्था कर दी गई थी। इधर संजय का हाल पागलों जैसा होता जा रहा था। लोग नए डंगरिए के आगे नतमस्तक होने लग गए थे। उनको लगने लग गया था कि अब संजय में पकड़ होने लगी है, आज रात तक खुलासा हो जाएगा, उधर संजय सोने को कमरे में चला गया। इधर घन्नूका ने पूरे गांव के लिए भोजन व्यवस्था बना रखी थी। लोग आराम से खाना पीना खा रहे थे।

उधर पीरबू के खाना खाने के बाद एक भोट्टी (रजाई) ओढ़ने के लिए और एक लधरीने (पीछे से तकिये जैसा आधार) के लिए पीछे रख दी गई थी। जोरदार देबत्योली हो रही थी। नामी गिरामी डंगरिये पांच किलो चांवलों का इस्तेमाल कर चुके थे, पांच लाकर फिर गद्दी में डाले जा चुके थे। ननिहाल से आए हुए देवता जी तो कभी कभी पांच पांच फीट भी कूद मार दे रहे थे।

तभी सोया हुआ संजय अचानक ही कहीं से घिघारू के जांठे के साथ अवतरित हुआ। और एक साइड से सबको जांठे से चूटते ले गया (चारों तरफ को भारी भरकम लाठी चलाना)। सभा में भगदड़ मच चुकी थी।

चारों डंगरियों ने एक स्वर में हार मानकर कहा कि यह तो बहुत बड़ी पकड़ है और हमारे बस की नहीं है, इतना कह कर चुपचाप खिसक लिए।। ननिहाल वाले डंगरिया देवता ने कहा “मैंने खोल दिया है निदान मेरे बस का नहीं है” कहकर रात ही अल्टो में वापस रवाना हो गए।

हवा हवाई प्रहार पीरबू के भी दो तीन पड़ चुके थे। उनकी भी दो तीन पसलियों ने अपनी जगह छोड़ दी थी। सारे गांव वाले अपने घरों को रात ही वापस आ गए। पीरबू भी डोली में डालकर उनके आंगन में पहुंचाए जा चुके थे। अब घन्नूका परेशान थे कि मसला खोल तो दिया इसे हल कौन करेगा।

संजय सोचने लगा अब यहां कुछ नहीं हो सकता, सिडकुल या नोएडा में काम करके ही पारिवारिक आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है। घन्नूका की मुश्किलें बढ़ चुकी थी अब तो ना पुराने डंगरिये आने को तैयार थे, ना ही संजय के ननिहाल के। उधर पीरबू लड़खड़ाती जुबान से जो कुछ बोलते वह घन्नूका को समझ नहीं आता। अधिक देर पीरबू के पास बैठना घन्नू का के लिए संभव नहीं हो पाता था, क्योंकि संजय के सटीक और तीक्ष्ण प्रहारों से घायल, घन्नूका के मार्गदर्शक पीरबू सारे कार्यक्रम बिस्तर में करने लगे थे।

नई समस्या जो आ गई थी कि संजय पर हुई पकड़ भी छुटानी थी, घन्नूका को इस मुसीबत से समय ही निकाल सकता था।

उधर संजय सबसे जान छुड़ाकर रिश्तेदार की सिफारिश पर नोएडा में प्राइवेट कंपनी में जांब करने लग गया। पिताजी की नौकरी से कुछ बचत होने पर व्यवसाय करने के विचार को संजय अब तिलांजलि दे चुका था। संजय समझ चुका था कि भैंसी के दूध की लगाई नौकरी भैंसी ही ले जाएगी।

– रमेश चम्पत

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