बुजुर्गों से दूर मोबाइल के और नजदीक जा रहे एकल परिवारों के नौनिहाल, सामाजिक चिंतकों ने जताई चिंता बुजुर्गों को लेकर बनना होगा समाज को संवेदनशील !
जिन बच्चों को दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची की गोद में खेलना था, वह गोद सिमट कर अब माता-पिता तक सीमित रह गई है। संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों ने अपने बच्चों को इस उम्मीद में पाला था कि बुढ़ापे में नाती-पोतों के साथ खुशी दिन कटेंगे, लेकिन एकल परिवारों की दौड़ में उनकी यह अभिलाषा आज अधूरी रह गई है। समाज के बदलते ताने-बाने की यह एक नई हकीकत बनकर सामने आ रही है। आजकल एकल परिवारों की दौड़ में घर के बुजुर्ग छूट रहे हैं। जबकि आज का बचपन मोबाइल में उलझकर रह गया है।
काली कुमाऊं के घरों में कभी तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं। बूबू खेत से कहानी लाते और आमा चूल्हे के पास बैठकर नाती-पोती को लोकगाथा सुनाती थी, उसी से बच्चे संस्कार सीखते थे। एकल परिवार होने से आज यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। पाटी क्षेत्र के एक वरिष्ठ ग्रामीण बताते हैं, “लोग बच्चों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा करते हैं, सोचते हैं पोते के साथ दिन कटेंगे। लेकिन बेटा, बहू और पोते को लेकर हल्द्वानी चला जाता है। अब घर के बूढ़े-बुजुर्ग फोन पर कभी-कभार पोते की आवाज सुन लेते हैं। इसी से संतोष करना पड़ता है।”
यह कहानी एक गांव की नहीं पाटी, बाराकोट, लोहाघाट से लेकर तल्लादेश तक सीमांत के अधिकांश गांवों में यही स्थिति सामने आ रही है। दशकों से हो रहे पलायन ने परिवार को तोड़ दिया है। युवा रोजगार के लिए शहर गया तो बच्चों को भी साथ ले गया है, इधर गांव में बुजुर्ग अकेले उम्मीदों के सहारे रह गए हैं। जो युवा गांव में शेष बचे हैं, उनकी स्थिति भी अलग नहीं है। शादी होते ही अधिकांश युवा संयुक्त परिवार छोड़कर एकल परिवार के तौर पर रहना पसंद कर रहे हैं। उनका वह समय जो मां-पिता की सेवा में लगना था, अब अपने ही दो-तीन लोगों के परिवार की चाकरी में लग रहा है। सुबह बच्चे को स्कूल छोड़ना, शाम को ट्यूशन लाना, मोबाइल दिखाना और उनकी हर जिद पूरी करने में दिन बीत रहा है।
पहले बच्चा बिगड़ता था तो दादा-दादी समझाते थे। अब दादा-दादी पास ही नहीं हैं। मां-पिता नौकरी या मजदूरी में व्यस्त हैं। बच्चा मोबाइल में लगा अकेलेपन का शिकार हो रहा है। उसे न लोककथा का पता है और न ही अपनी दूधबोली का ज्ञान ही ठीक ढंग से हो रहा है। एकल परिवार के बच्चों में बुजुर्गों से दूरी का असर साफ दिख रहा है। आमा-बूबू से जो संस्कार, भाषा और जीवन का अनुभव मिलता जो वह अब नहीं मिल रहा है। बच्चे पहाड़ी नहीं, किताबी हिंदी और अंग्रेजी सीख रहे हैं। उन्हें घसियारी, रोपाई या मेलों की कहानियां कम ही पता हैं। वे दादी के हाथ के बने सिसूण के साग और भट्ट की चड़कानी से भी अनजान हैं। बाराकोट के युवा गिरीश कहते हैं पहले संयुक्त परिवार में बुजुर्ग होते थे तो बच्चे की चिंता किए बिना मां-पिता खेत चले जाते थे। अब एकल परिवार में मां को ही दिनभर बच्चे के पीछे रहना पड़ता है इसलिए वह न खेत जा पाती है और न बुजुर्गों की सेवा कर पाती है।
सामाजिक चिंतकों का कहना है जब तक दादा-दादी साथ रहते हैं, परिवार में संतुलन बना रहता है। बुजुर्ग बच्चों को संभालते हैं और युवा खेती और कमाई का काम करते हैं। अब एकल परिवार में युवा ही बच्चा संभाल रहा है इससे बुजुर्ग और बच्चे दोनों अलग-थलग पड़ गए हैं। हालांकि कुछ परिवार अभी भी परंपरा को बचाए हुए हैं। चंपावत के एक परिवार में आज भी 7-8वीं में पढ़ने वाले पोते दादी के साथ बतियाते और सोते हैं। मुखिया केशव दत्त का कहना हैं बच्चे को जितना उसकी दादी सिखा सकती है, उतना कोई नहीं सिखा सकता। लेकिन ऐसे परिवार अब उंगलियों पर गिने जाने लायक ही बचे हैं। आधुनिक और एकल घरों से बुजुर्गों के कमरे तक गायब हो गए हैं।
– ललित मोहन गहतोड़ी



