छोटी बहू

लेखक: दिनेश जोशी 'नीरव'

गाड़ी आँगन में आकर रुकी। गंगादत्त अपने दोनों बेटों का सहारा लेकर उतरे। महीने भर की बीमारी ने चेहरे का रंग बदल दिया था। गहुएँ भरे-भरे गालों की जगह पीले गड्ढे नज़र आते थे। कपड़े ऐसे झूल रहे थे जैसे शरीर सिर्फ हड्डियों का बना हो।

“प्रणाम”, साड़ी का पल्लू सर पर रखते हुए बड़ी बहू आरती ने दोनों हाथों से चरण-स्पर्श किया।

“अब आप अपने घर में आ गए हैं, सब ठीक हो जायेगा”, उसकी बातों में सेवा भाव भी था और आश्वासन भी।

गंगादत्त ने सर ऊपर उठाया, एक पल को आँखों के आगे सारा ब्रह्माण्ड नाच उठा। काँपते हुए हाथ सर पर रख कर आशीर्वाद में बोले, “सौभाग्यवती”। फिर कुछ देर इधर-उधर देखने के बाद बेटों को अपने कमरे में ले चलने का इशारा किया।

कमरा उनकी उम्मीद के उलट काफी अच्छा सजा हुआ था। मन में सोचने लगे, “बड़ी बहू को बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी, कितना सेवा भाव रखती है। रोहित की माँ के जाने के बाद सारा घर इसी ने संभाला हुआ है”। एक गहरी सांस ली। फिर जाने क्या सोचा कि बीमारी के बावजूद चेहरे पे संतुष्टि का भाव आ गया। ये संतुष्टि उनके पिछले कुछ दिनों के अनुभव पर आधारित थी जो उनके पिछले कुछ सालों के अनुभव को सही साबित कर रहा था।

अक्सर कोई एक सोच, कोई एक भावना, दिल के गहरे परतों में उलझी हुई, इंसान के दिमाग को किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाती है। ऐसी दुनिया जहाँ दिल और दिमाग के बीच एक जंग जारी है, सदियों से चलती हुई, शायद सदियों तक चलने वाली जंग… ऐसी जंग कि दिल तो जलता रहता है मगर दिमाग हैरान रहता है और चेहरा बेवजह लाल रहता है जिसे लोग खुशी मानकर धोखा खाते रहते हैं।

क्या गंगादत्त भी ऐसी किसी सोच के प्रभाव में आकर अन्दर ही अंदर खोखले हो गए हैं और बाहर से एकदम तने हुए लगते हैं, जैसे कोई पेड़ पूरी द्रढता से खड़ा हो पर भीतर से खोखला हो गया हो, पर उसके खोखलेपन का पता उसके ढह जाने पर ही चलता है?

जिस वक़्त से घर में आये हैं, छोटी बहू को लेकर कई सवाल उनके मन में मंडरा रहे हैं।

छोटी बहू न तो उनसे हस्पताल में मिलने आई, ना ही घर के गेट पर, ये सोच कर वो मन में खुश थे कि उसके बारे में उनका निर्णय सही निकला, मगर साथ ही दिल में दुखी भी थे कि जाने कैसे-कैसे दिन देखने पड़ रहे हैं उन्हें, आखिर बहू तो उनके ही अपने घर की थी।

मगर ये कहना भी मुश्किल था कि गंगादत्त जैसा सुलझा हुआ, शांतिप्रिय आदमी अपने हृदय में इतना कोलाहल समेटे हुए था।

गंगादत्त अपनी छोटी बहू से खुश नहीं थे, ये कोई छुपी हुई बात नहीं थी। दीपक ने अपने मन की लड़की से शादी की उन्हें इस बात का ग़म न था, ग़म था कि उनसे कोई राय नहीं ली गयी। अपने भरे पूरे परिवार में एक बिना बाप की लड़की का आना वो स्वीकार नहीं कर सकते थे।

“लेकिन, पापा, प्रभा को उसके गुणों से परखिये। मुझ पर भरोसा कीजिये, वो इस घर की अपनी होकर रहेगी,” दीपक ने कहा था।

“ठीक है, तुम्हें जो सही लगे वो करो। आज मैं तुमसे कोई उम्मीद नहीं कर रहा हूँ, कल तुम मुझसे कोई उम्मीद मत करना”.. उन्होंने कहा…

“लेकिन आपकी मर्जी के बिना”…

“अब इस बारे बात करने का कोई फायदा नहीं जब तुम पहले ही फैसला ले चुके हो तो…”

“जैसी तुम्हारी मर्जी….”

गंगादत्त लाख चाहकर भी शादी न रोक पाए लेकिन इसके लिए वो दीपक और अपनी पत्नी दोनों से बुरी तरह रूठ गए थे। और प्रभा के लिए उनकी सारी सहानुभूति क्रोध और नफरत में बदलती गयी। वो मॉडर्न लड़कियों की तरह निकलती तो बड़ी बहू से उसकी तुलना करते, पढ़ लिख कर जॉब करना चाहती तो उसे घर की परंपरा के खिलाफ बताते। कुल, वो एक नयी कल की लड़की को अपने घर में पराया ही रखना चाहते थे, उसी घर में उसका ब्याह होने के बाद भी आज तक गंगादत्त के मन में दिन रात ये ज्वार भाटा चलता रहता था।

आज भी इसी उधेड़बुन में देर तक गोते लगाने के बाद गंगादत्त की पलकें भारीं हो आयीं, शायद दवा की वजह से या कई दिनों की थकान की वजह से। खैर, जब सोये तो इस तरह जैसे एक अरसे से न सोये हों और बीते हुए कल और आने वाले कल की सारी नींद आज ही पूरी कर लेना चाहते हों। जैसे आने वाले कल का कोई ऐतबार ही ना हो।

एक लम्बी गहरी सांस लेकर प्रभा बोली, “हाँ थक तो गयी हूँ, पर खुशी है कि दफ्तर में मेरी अर्जी मान ली गयी। मैं अगले बीस दिनों की छुट्टी पे रहूँगी, ये सुनकर बड़े बाबू परेशान हो गए थे… लेकिन मैंने कई सारे काम आज ही निपटा कर उन्हें मना ही लिया… वापस ऑफिस ज्वाइन करने पर कुछ दिन एक्स्ट्रा काम करना पड़ेगा… पर ये सब काम मेरे घर की जिम्मेदारियों से बढ़कर नहीं हैं”।

कुछ देर ख़ामोशी, गंगादत्त को लगा दीपक ने प्रभा का हाथ थपथपाकर उसे धन्यवाद दिया होगा।

“इतने दिन तुम पापा का ख्याल रखो… उन्हें हम सबकी ज़रूरत है..” दीपक ने कहा।

“तुम बिलकुल चिंता मत करो… सब ठीक हो जायेगा…”

“ऐसा ही हो…. बस थोडा पैसे को लेकर भी…”.. खैर देखते हैं…”

“मैंने ऑफिस में अपनी सेविंग्स से लोन ले लिया है… परसों तक मिल जायेगा… कोई दिक्कत नहीं है…”

“पता नहीं तुम नहीं होती तो कैसे मैनेज हो पाता?”

“सब ठीक है… आप कल दवाइयां ले आइयेगा”

गंगादत्त के लिए इसे सच मानना बहुत मुश्किल था… जितना मुश्किल उससे कहीं ज्यादा कष्टप्रद। अगर ये स्वपन सच है तो उनका कितना बड़ा भरम टूट जायेगा, छोटी बहू को लेकर बनायीं हुई सारी भ्रांतियां मिट जायेंगीं, लेकिन इस सब में उनके अन्दर भी तो एक सैलाब आएगा। जो कहेगा कि अपने गलत रवैये से उन्होंने खुद को ही कितना नुक्सान पहुंचाया है।

वो धीरे से चारपाई से उठे, इतने धीरे से कि खुद उनके क़दमों को आभास न हो। डरते थे कि कहीं कोई जाग न जाये। बाहर बरामदे में आकर एक तिपाई पर हाथ का सहारा लेकर बैठ गए, पानी पिया, कुछ देर आसमान में एक जैसी गति से चलते हुए चाँद को निहारते रहे। उठकर चलने को हुए तो चाँद को फिर देखा, चाँद ने जैसे मुस्कुरा कर कहा हो, “कोई जाने न जाने मैं जानता हूँ, किसी से कह सको न कह सको, मुझसे कहो”। जितने धीमे गए थे उतनी ही तेज़ लौट आये। फिर बड़ी देर तक यूँ ही छत को निहारते रहे।

उनकी तंद्रा दरवाजे के खुलने से टूटी। बड़ी बहू आरती थी, रात का खाना लेकर आई थी।

तब क्या वो सच में दिवास्वपन देख रहे थे?

“खाना खा लीजिए, फिर दवा खाकर आपको आराम करना चाहिये”, खाना रखते हुए आरती बोली। गंगादत्त ने आरती की ओर देखा, उसकी आँखों में एक भारीपन था, चेहरे पे उदासीनता थी और उसके हाव भाव में एक तेजी थी जैसे वो सब कुछ जल्दी-जल्दी निपटाना चाहती हो। जैसे उसे इस जगह से कोई लगाव न हो और वो इस सब से दूर जाना चाहती हो। गंगादत्त ने इशारों-इशारों में उसे जाने को कहा और उठ कमरे में टहलने लगे। जान चुके थे कि दिवास्वपन ही सच्चाई है। अनमने से कुछ खाकर फिर लेट गए नींद आने का इंतज़ार करते हुए।

गंगादत्त सुबह उठे तो माथा भारी था, मगर अन्दर ही अन्दर उन्होंने एक शांति महसूस की। खिड़की से धनुष की तरह फैला हुआ अल्मोड़ा शहर दिखाई दिया और दूर पंचाचूली की सफ़ेद चोटियाँ। गंगादत्त बचपन से सोचते थे कि जब भी वो खुश होते थे, जब भी कोई मजबूत इरादा करते थे न जाने क्यों पंचाचूली की चोटियाँ और ज्यादा ऊँची लगने लगती थीं।

उन्होंने कमरे में नज़र दौड़ाई, कमरा साफ़ कर दिया गया था, उनका पसंदीदा रेडियो रख दिया गया था और कुछ कहानियों की किताबें भी।

गंगादत्त बरामदे में आये, आरती कहीं नहीं दिखाई दी, उन्होंने किसी से नहीं पूछा।

उसके बच्चे भी खेलते नहीं दिखे, उन्होंने इस बारे में सोचा नहीं। रसोई में प्रभा नाश्ता बना रही रही थी, वो ऑफिस नहीं गयी, उन्होंने किसी से वजह जानने की कोशिश नहीं की। प्रभा का बेटा वहीं दौड़ता हुआ आ पहुंचा। गंगादत्त ने उसे गोद में उठाया और अपने कमरे में चले गए। खिड़की पूरी खोल दी, सर्दी की गुनगुनी धूप धूल के साथ मिलकर सात रंगों में टूट रही थी। बच्चे को गोद में लेकर खिड़की के पास खड़े हो गए, एक पल को आँखें बंद की और फिर खोल लीं।

सर्दी की उस सुबह अल्मोड़ा और भी धनुषाकार लगने लगा…..

पंचाचूली की सफ़ेद चोटियाँ और ज्यादा सफ़ेद, और ज्यादा ऊँचीं लगने लगीं।

– दिनेश जोशी ‘नीरव’

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