ख़्वाब और ज़रूरतें

लेखक: दिनेश जोशी 'नीरव'

तभी मोड़ पर बस आती हुई दिखाई दी …

उसकी तंद्रा टूटी, काफी देर से वो पास बैठी औरत की तरफ ध्यान लगाये बैठा था। उसकी आँखें इस तरह हो रहें थीं, कहना मुश्किल था वो जाग रहा है या सो रहा है।

बस का हॉर्न सुनाई पड़ा। एक पल को उसे अपना बचपन याद आ गया। इन्हीं पहाड़ी सड़कों पर बस का इंतज़ार करते हुए चाय की छोटी सी दुकान पर बैठते थे वो लोग। परिवार भी क्या था, कुल तीन लोग ही थे, माँ बाप और वो खुद। चाय की उस छोटी दुकान पर एक बुढिया बैठती थी। लोहे की एक लम्बी नाल सी फूकनी वहीं पड़ी रहती थी। जब भी बुढिया आग तेज़ करने के लिए फुकनी से हवा मारती, एक धीमी सी आवाज़ निकलती थी, जैसे किसी मोड़ पर बस का हॉर्न बज रहा हो भागकर वो सड़क पर आ जाता था।

“बेटा वो बस की आवाज़ नहीं है, इस फूकनी से निकलती हुई आवाज़ है” पापा ने समझाया था।

“ठीक है” उसने सर हिलाया और वापस दुकान पर आ बैठा। उत्सुकता का ऐसा नीरस अंत उसे पसंद नहीं आया। बस पास आ रही थी।

क्या आजकल के बच्चे भी बस के हॉर्न और फूकनी की आवाज़ से धोखा खाते होंगे? उसने सोचा

“नहीं, वो स्मार्ट हैं और अब किसके बच्चे पहाड़ों में रहते हैं? तर्क ने एक पल में ही उसका सवाल ख़त्म कर डाला।

वो उठा, हाथ पैर फैला कर अंगड़ाई ली और सामन इकठा करने लगा। सामन के नाम पर एक बैग था, कागजों और कपड़ों से भरा हुआ। उसने तीसरी बार बैग चेक किया और फिर चैन लगा दी।

“सुनिए!”, एक पतली आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ डाला,
“क्या आप ये सामान बस में चढ़ाने में मदद कर सकते हैं ? मुझे अपनी बेटी और इतना सामान चढाने में परेशानी हो रही हैं आप प्लीज इसे…”
वही औरत थी “लाइए ” वो बोला बस एकदम भरी हुई थी। बड़ी मुश्किल से उसने औरत का सामान अन्दर डाला। फिर तीनों लोग बस में चढ़ गए। बस चल पड़ी। पीछे एक सीट खली देखकर वो बोला “आप यहाँ बैठ जाइये” “शुक्रिया ” हलकी मुस्कराहट के साथ जवाब मिला, वो वहीं खड़ा हो गया।

पहली बार उसने उस औरत को ध्यान से देखा, कुछ तीस-एक साल की रही होगी। उसकी बेटी भी चार साल के पास लग रही थी। बेटी अपनी माँ की गोद में कुछ इस तरह बैठी थी मानो वो सीट उसके लिए हमेशा ही रिज़र्व हो।

“सॉरी, आपको हमारी वजह से तकलीफ हुई “, औरत की आवाज़ में सचमुच कृतज्ञता थी।

कोई बात नहीं ” वो सजह होकर बोला।

“तो क्या वो नयी नयी शहर गयी थी या पहली बार जा रही थी ” उसने सोचा। वो शहर की उस भीड़ से कितना अलग थी जो किसी की मदद को भी एहसान या interference की तरह देखती है।

” interference ! अजीब शब्द है ” उसके दिमाग में कौंधा कितनी आसानी से रमा ने इस शब्द से उसका परिचय कराया था।

“ये मेरी अपनी जिंदगी है, मेरी पसंद नापसंद मेरी अपनी है | for god sake, don’t try to interfere in my personal matters” रमा ने उसे दो टूक कह डाला। उसने तो रमा के कुछ आवारा दोस्तों का जिक्र किया था और उसकी देर रात तक पार्टी करने की आदत पर फ़िक्र जताई थी। लेकिन रमा तो किसी दूसरी धुन में थी।

Personal Matters!! ” किसी की ज़िंदगी में थोडा सा सुझाव देना गलत है ? वो भी जब वो आपका जीवन साथी बनने वाला हो | इतना सा भी हक नहीं ” उसने गालों तक पहुचते हुए पसीने को पोंछ डाला।

तुम्हें मेरे दोस्तों या मेरी आदतों से दिक्कत हो तो तुम मुझे छोड़ सकते हो | I am not meant for compromises! compatibility ना हो तो रिश्ता रखने का कोई मतलब नहीं है ” रमा ने उससे साफ़ बोल दिया बस का तेज़ ब्रेक लगा और वो आगे की ओर सरका, इतना तेज़ की गिरते गिरते बचा। इससे पहले की वो कुछ समझ पता, कुछ कह पता, रमा जा चुकी थी, शायद हमेशा के लिए।

बस अब थोड़ी समतल सड़क पर आ चुकी थी। उसने देखा सामने बैठी औरत नींद के तेज़ झोंके में खो चुकी है। बस के हर टर्न के साथ उसका बदन कभी एक ओर झूल जाता, तो दुसरे उलटे मोड़ पर दूसरी ओर।

औरत की अँगुलियों से टिका उसका पर्स बार बार फिसलता और बार बार वो अंगुलियाँ उसे संभाल लेतीं। पर्स काफी भरा हुआ लग रहा था जो उसके बेतरतीब उभरे हुए रूप से पता लग रहा था। शायद काफी पैसे और जेवर भरे पड़े थे।

उसने अपने बैग को खोलकर देखा, दो किताबें, एक जोड़ी कपड़े और बेकार के कुछ सर्टिफिकेट्स।

ऐसा नहीं था की सारे सर्टिफिकेट्स बेकार हों, खासकर वो जो उसे प्रदेश के राज्यपाल ने यूनिवर्सिटी टॉप करने पर दिया था। कागज़ के उस टुकड़े पर करीने से पक्का लेमीनेशन किया हुआ था।

“लेकिन, जो सर्टिफिकेट तुझे नौकरी न दिला सकें, वो बेकार ही हैं ना, कागज़ के टुकड़े से बढ़कर कुछ नहीं”
उसके दोस्त राजीव ने समझाते हुए कहा था।

“जिसे तुम कागज़ का टुकड़ा कहते हो, उसके लिए मैंने जी तोड़ मेहनत की है | अपनी और अपनों की कई खाव्हिशों को कुर्बान किया है इन्हें हस्सिल करने के लिए | इस उम्मीद में की एक दिन में कोई अच्छी नौकरी कर सकूं, अपना एक मुकाम बना सकूं” उसने तर्क किया।

राजीव हंसा, ऐसे जैसे के उसका मजाक उदा रहा हो। ” आजकल नौकरी केवल हुनर और क्वालिफिकेशन के बूते नहीं मिलती | सोर्स, सिफारिश, पहचान, reco, रिश्वत, कुछ भी कह लो इसे, पर ये भी जरूरी हो गया है”।

वो असहज हो उठा, गले का थूक निगला, बड़ी मुश्किल से बोल पाया

“मतलब, तुम्हारी कंपनी में भी नहीं ?” देखो !, राजीव की आवाज़ थोड़ी भरी हो गयी…

तुम्हारे खेत तो हैं गाँव में .. उन्हें बेच कर पैसों का इंतजाम कर लो… मैं मेनेजर और बोर्ड के बाकि लोगों से बात कर लेता हूँ मैं कोशिश करूंगा ही … लेकिन… तुम्हें भी कुछ करना पड़ेगा.. इस सिचुएशन में अपनी मदद तुम खुद ही कर सकते हो..”

वो समझ गया कि क्या करना होगा, अगले ही दिन गाँव चला आया। गाँव आकर पता चला कि उसके सरे खेत उसकी अनपढ़ माँ से और लोगों ने अपने नाम करवा लिए। उसे वापस लौटना था, मगर खली हाथ।

पैसे और सोर्स की अहमियत उसे समझ आ चुकी थी।

अगले स्टेशन से कुछ और लोग बस में चढ़ गए। अब वो औरत के काफी करीब था। पर्स अब भी उसी तरह औरत की अँगुलियों पर नाच रहा था। अचानक उसकी अंकों में चमक आ गयी। दिल ने प्रतिकार किया लेकिन दिमाग ने असमंजस को दुस्साहस में बदल दिया। उसने एक नज़र चरों और दौड़ाई, हाथ आगे बढ़ाये और अगले ही पल पर्स उसके हाथ में था।

उसने तुरंत बस से उतर जाना चाहा लेकिन न जाने किस कौतुहल ने उसे रोक लिया। उसका खुद पर कोई वश ना चल पाया, बस में काफी आगे आ गया, जहाँ वो औरत की नज़रों से दूर था। उसने बैग की तलाशी शुरू कर दी।

रुपयों की एक मोती तह बेतरतीब रही पड़ी थी। नोटों पर गाँधी जी मुस्कुरा रहे थे, जैसे उस पर हंस रहे हों। इन सब के नीचे एक सादा कागज़ मुदा तुड़ा रक्खा था। उसने कागज़ उठाया, खोला। कोई चिट्ठी थी। उसने पढना शुरू किया, अक्षरों की बनावट से ज्यादा मायना उनकी भावना का होता है।

“प्रिय दीदी, शायद आप मुझे नहीं जानती हैं। शायद जानने के बाद आप इसे फाड़ दें, लेकिन लिखना मेरा फ़र्ज़ है और उससे ज्यादा मेरी मजबूरी।

शायद आप नहीं जानतीं की आपके पति इतने सालों से घर क्यों नहीं आते, इसकी एक वजह में भी हूँ।

शहर आकर आपके पति ने मुझसे शादी कर ली | हमारा एक दो साल का बेटा भी है और उसीकी वजह से ये चिट्ठी लिख रही हूँ। हमारा बेटा बहुत बीमार है और इलाज़ का खर्च हमारी हैसियत से बाहर है।

पहाड़ों में आपके कई खेत हैं, इनसे सुना था | ये शायद कभी नहीं कह पाते, पर अपने बच्चे को पल पल मरते मैं नहीं देख पाई।

शायद आप मदद न करें, शायद आप मुझसे नफरत करें, शायद मुझे बद्‌दुआ दें | लेकिन एक माँ होने के नाते मेरा दिल कहता है के आप हमारी मदद ज़रूर करेंगी।

आपकी
प्रभा”

उसकी आँखों से निकलकर एक मोती कागज़ के टुकड़े को गीला कर गया। उसका दिमाग सुन्न था, उसके हाथ काँप रहे थे, उसकी आखें नम थीं, उसके गाल शुष्क हो रहे थे।

उसके दिमाग में यूनिवर्सिटी के अंतिम दिन घूमने लगे। उसे अपना लिखा हुआ एक प्ले याद आ गया एक लकडहारा है जो जीने की लिए दिन में लकड़ियाँ काटता है, लिकिन रात में चुपचाप उन्हीं पेड़ों से लिपट कर रोता है। हर साल दस नए पेड़ लगाता है। उसे प्ले की मेन दो लाइन्स याद हो आयीं

“आँखों में हरियाली और हाथों में कुल्हाड़ियाँ
ख़्वाब आज भी ज़रूरत से हार बैठा है “

उसके अपने कई ख़्वाब , कई आदर्श ज़रूरतों से हार बैठे थे या हारने की कगार पर थे। रमा जा चुकी थी, नौकरी का पता ना था, खेत बिक चुके थे, दोस्त मतलबी हो चुके थे और अब वो चोर भी बन रहा था।

“संतनगर की सवारियां उतारी जाएँ ” कंडक्टर की कर्कश लेकिन सधी हुई आवाज़ ने उसे फिर वर्तमान में ला दिया। उसकी संवेदनाएं वापस लौट आयीं। औरत अभी भी उन्मुक्त सो रही थी। चुपचाप उसे पर्स औरत की सीट पर उसके पास में रख दिया। अपना बैग लेकर वो उतरने लगा।

उसे लगा शायद कोई उसे घूर रहा है, जैसे दो आँखें उसका पीछा कर रही हों। उसने पीछे मुड़कर देखा, सचमुच दो मासूम आँखें उसे एकटक देख रहीं थीं। नन्हीं बच्ची उसे देख कर मुस्कुरायी, आँखें चमचमा उठीं, जैसे उसे धन्यवाद दे रही हों।

वो हल्का सा मुस्कुराया, और तेजी से बस से उतर गया। उसे अपना सर एकदम हल्का महसूस हुआ।

ख़्वाब और आदर्श आज ज़रूरतों से जीत चुके थे, लेकिन कब तक?
कल उसे फिर से शुरुआत करनी होगी, फिर नौकरी ढूँढने जाना होगा, फिर समाज से दो चार होना पड़ेगा।

कई कठिन सवाल उसके सामने थे, लेकिन आज के लिए वो खुश था। गुनगुनाता हुआ वो आगे बढ़ गया।

उसके सामने थी संतनगर की गलियाँ, धूल और धक्के और पीछे थी दूर और दूर होती हुई बस।

– दिनेश जोशी ‘नीरव’

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