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काली कुमाऊं • पोस्ट

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पहाड़ और जीवन से जुड़े विचारों, अनुभवों और लेखों का संग्रह।

  • गोठ से गैरेज तक: बदलती संस्कृति और आधुनिकता की होड़

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    गोठ से गैरेज तक: बदलती संस्कृति और आधुनिकता की होड़

    गाय बांधने की जगह वाहन और घर के भीतर श्वान,आधुनिकता की आड़ में इनका हो रहा सम्मान! भारतीय परंपरा में घर को मंदिर की संज्ञा दी गई है। घर के बुजुर्ग कहते हैं जिस घर में गाय बंधी हो वहां कभी नकारात्मकता नहीं आती है। गाय के गोबर से आंगन लीपा जाता है, गोमूत्र से…

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  • बीद

    लेखक: रमेश चम्पत

    बीद

    बारिश धीमे होते ही बाहर निकल आता हूं मैं, इसी को हमारे यहां बीद होना कहते हैं। मित्रो हिन्दी भाषा में ऐसा कोई शब्द हो तो अवश्य बताना। बीद इस बात की गारंटी नहीं होती कि मौसम साफ ही होगा।हल्की हल्की फुहार कभी कभी आती रहती हैं। हमारे यहां बीदा होने के बाद घाम आएगा…

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  • लाट साहब

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    लाट साहब

    अपना ओहदा शहर में छोड़कर गांव पहुंचिए, बिरादरी में एटीट्यूड नहीं चलता यहां आज भी अपनेपन का राज है। आप बाहर जाकर कितने बड़े अधिकारी बन जाओ, कितने बड़े नेता, पत्रकार, अध्यापक और बिजनेसमैन बन जाओ गांव वाले आपको वही समझेंगे जो समझ आपको लेकर उनकी नजर में बनी हुई है। यह पहाड़ का एक…

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  • पलायन और उदासीनता: क्या इतिहास बन जाएगी पहाड़ की बैठकी संस्कृति?

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    पलायन और उदासीनता: क्या इतिहास बन जाएगी पहाड़ की बैठकी संस्कृति?

    पलायन और उदासीनता ने छीनी पहाड़ की बैठकी सांस्कृतिक पहचान,गांव-गांव गूंजने वाले भजनों की थाप और बैठक की महफिलें हो रही सुनसान ! कभी काली कुमाऊं के हर गांव में शाम ढलते ही बैठक मंडली भजन और राग छेड़ने बैठ जाती थी। ढोलक की थाप, हारमोनियम की धुन और मंजीरे की खनक पर जब बुजुर्ग…

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  • पहाड़ों से गायब होती ‘पाली-पल्ट’ परंपरा और बंजर होते खेत-खलिहान

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    पहाड़ों से गायब होती ‘पाली-पल्ट’ परंपरा और बंजर होते खेत-खलिहान

    पाली और पल्ट जैसी सामूहिक परंपराओं के संरक्षण की है समाज को दरकार,जंगली जानवरों के आतंक और पलायन से हो रहे खेत-खलिहान बंजर बेकार ! बुजुर्गों से चली आ रही पाली और पल्ट जैसी सामूहिक परंपराएं पहाड़ की असली विरासत रही हैं। इन परंपराओं से गांव के सभी काम चुटकियों में निपट जाते थे, लेकिन…

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  • वर्चुअल दुनिया का कड़वा सच: सोशल मीडिया कैसे तोड़ रहा है बरसों पुरानी दोस्ती?

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    वर्चुअल दुनिया का कड़वा सच: सोशल मीडिया कैसे तोड़ रहा है बरसों पुरानी दोस्ती?

    सोशलमीडिया के दौर में आजकल लोगों की लड़ाई भी हो गई सोशलमीडि(आई) ! लाइक, कमेंट की मामूली बात पर टूट रही सालों साल की दोस्ती, झगड़े का बन रहा मुख्य कारण।                                                     समाज में कभी जर, जोरू, जमीन या आपसी कहा-सुनी को लेकर लोगों के बीच लड़ाइयां झगड़े होते थे, लेकिन वर्तमान सोशलमीडिया के…

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  • असोज : शुरू हुई घास कटाई की पारंपरिक मुहिम, मशीनीकरण ने भी दी रफ्तार

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    असोज : शुरू हुई घास कटाई की पारंपरिक मुहिम, मशीनीकरण ने भी दी रफ्तार

    पहाड़ में असोज लगते ही शुरू हुआ घास कटाई का कार्य, मशीन से भी हो रही अब घास कटाई, साल भर के लिए पशु चारे का इंतजाम, सुखाकर डालते हैं लुट्टा, पलायन से मांगों में सूख रही घास असोज का महीना शुरू होते ही पहाड़ के गांवों में घास कटाई शुरू कर दी जाती है।…

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  • सिमटते संयुक्त परिवार और मोबाइल में उलझता आधुनिक बचपन

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    सिमटते संयुक्त परिवार और मोबाइल में उलझता आधुनिक बचपन

    बुजुर्गों से दूर मोबाइल के और नजदीक जा रहे एकल परिवारों के नौनिहाल, सामाजिक चिंतकों ने जताई चिंता बुजुर्गों को लेकर बनना होगा समाज को संवेदनशील ! जिन बच्चों को दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची की गोद में खेलना था, वह गोद सिमट कर अब माता-पिता तक सीमित रह गई है। संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों ने अपने…

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  • भागती दुनिया और ठहरते पल: प्रकृति के आंचल में सुकून की तलाश

    लेखक: ललित मोहन गहतोड़ी

    भागती दुनिया और ठहरते पल: प्रकृति के आंचल में सुकून की तलाश

    आ कहीं दूर चले जएं हम दूर इतना कि हमें छूं ना सके कोई गम। किसी हिंदी फिल्म के इस गीत के बोल का बेजोड़ शब्द शिल्प आज आपके लिए बहुत कुछ कह रहा है। सचमुच गम की दुनिया से दूर कही़ं एकांत में यदि आपका बैठने का मन कर रहा है तो हम आपको…

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